(राग सारंग)
बैठे हरि राधा संग, कुंजभवन अपने रंग,
कर मुरली अधर धरै सारंग मुख गाई । [1]
मोहन अतिही सुजान परम चतुर गुण निधान,
जानबूझ एकतान चूककें बजाई ॥ [2]
प्यारी जब गहयो बीन सकल कला गुण प्रवीन,
अति नवीन रूप सहित वही तान सुनाई । [3]
वल्लभ गिरधन लाल रीझ दई अंकमाल
कहत भलें भलें लाल सुंदर सुखदाई ॥ [4]
- श्री वल्लभ दास
श्री कृष्ण, प्रेम रंग में सराबोर होकर, श्री राधा के साथ कुंज भवन में बैठे हैं और होठों पर मुरली को लगाकर राग सारंग गा रहे हैं । [1]
श्री श्यामसुन्दर जो मोहन हैं, अति सुजान हैं, परम चतुर हैं एवं समस्त गुणों की ख़ान हैं, वे जान बूझ कर एक तान को चूक जाते हैं । [2]
अब उनकी प्यारी श्री राधा, जो समस्त कलाओं की ख़ान हैं, जो समस्त गुणों में परम प्रवीण हैं, वे अपनी वीणा से उसी तान को एक नवीन रूप से बजाती हैं । [3]
श्री वल्लभदास कहते हैं, जिसे सुनकर, श्री गिरिधर लाल विभोर हो उठते हैं और अपनी कंठमाल श्री राधा को देकर कहते हैं "वाह, वाह, अत्यंत सुंदर, हे प्यारी, तुम ही मेरे सुख का कारण हो”। [4]
बैठे हरि राधा संग, कुंजभवन अपने रंग,
कर मुरली अधर धरै सारंग मुख गाई । [1]
मोहन अतिही सुजान परम चतुर गुण निधान,
जानबूझ एकतान चूककें बजाई ॥ [2]
प्यारी जब गहयो बीन सकल कला गुण प्रवीन,
अति नवीन रूप सहित वही तान सुनाई । [3]
वल्लभ गिरधन लाल रीझ दई अंकमाल
कहत भलें भलें लाल सुंदर सुखदाई ॥ [4]
- श्री वल्लभ दास
श्री कृष्ण, प्रेम रंग में सराबोर होकर, श्री राधा के साथ कुंज भवन में बैठे हैं और होठों पर मुरली को लगाकर राग सारंग गा रहे हैं । [1]
श्री श्यामसुन्दर जो मोहन हैं, अति सुजान हैं, परम चतुर हैं एवं समस्त गुणों की ख़ान हैं, वे जान बूझ कर एक तान को चूक जाते हैं । [2]
अब उनकी प्यारी श्री राधा, जो समस्त कलाओं की ख़ान हैं, जो समस्त गुणों में परम प्रवीण हैं, वे अपनी वीणा से उसी तान को एक नवीन रूप से बजाती हैं । [3]
श्री वल्लभदास कहते हैं, जिसे सुनकर, श्री गिरिधर लाल विभोर हो उठते हैं और अपनी कंठमाल श्री राधा को देकर कहते हैं "वाह, वाह, अत्यंत सुंदर, हे प्यारी, तुम ही मेरे सुख का कारण हो”। [4]

