रहन देत नहिं और रस, यहै प्रेम की टेक।
याको सहज सुभाव यह, करत दोइ ते एक॥
- श्री ध्रुवदास, प्रीति चौवनी (12)
वृन्दावन के प्रेमी संत कहते हैं कि प्रेम का यह हठ होता है कि वह अन्य किसी रस का समावेश नहीं होने देता। प्रेम का यह सहज स्वभाव है कि वह दो को एक कर देता है—अर्थात् प्रेमास्पद एवं प्रेमी को एक बना देता है।
याको सहज सुभाव यह, करत दोइ ते एक॥
- श्री ध्रुवदास, प्रीति चौवनी (12)
वृन्दावन के प्रेमी संत कहते हैं कि प्रेम का यह हठ होता है कि वह अन्य किसी रस का समावेश नहीं होने देता। प्रेम का यह सहज स्वभाव है कि वह दो को एक कर देता है—अर्थात् प्रेमास्पद एवं प्रेमी को एक बना देता है।

