(राग कान्हरौ)
और कोऊ समझे सो समझे हमकूँ इतनी समझ भली ।
ठाकुर नंदकिशोर हमारे ठकुरानी वृषभान लली ॥ [1]
श्रीदामा आदि सखा श्याम के श्यामा संग ललितादि अली ।
व्रजपुर वास शैल वन फिहरत कुंजन कुंजन रंग रली ॥ [2]
इनके लाड़ चाहु सुख सेवा भाव वेल रस फलन फली ।
कहि भगवान हित रामराय प्रभु सबन तें इनकी कृपा भली ॥ [3]
- श्री हित रामराय जी
और जिसे जो समझना हो वो समझे मुझे तो केवल इतनी ही समझ भली है कि मेरी ठाकुर नंदनंदन हैं और ठकुरानी श्री राधा महारानी हैं । [1]
श्री कृष्ण के मित्र श्रीदामा एवं अन्य ग्वालबाल हैं तथा श्री राधा की सखियाँ ललिता आदि हैं। वे ब्रज में निरन्तर निवास करते हैं और उनके साथ विभिन्न कुंजों में प्रेम क्रीड़ा करते हैं । [2]
मेरी एक ही इच्छा है कि मैं प्रिया प्रियतम को प्रेम से लाड़ लड़ाऊँ और इनकी निस्वार्थ भाव से सेवा करूं जिससे मेरी भाव रूपी बेली में फल लग सके । श्री हित रामराय जी कहते हैं, “श्री प्रिया प्रियतम जितनी कृपा करते हैं उतना तो कोई भी नहीं करता "। [3]
और कोऊ समझे सो समझे हमकूँ इतनी समझ भली ।
ठाकुर नंदकिशोर हमारे ठकुरानी वृषभान लली ॥ [1]
श्रीदामा आदि सखा श्याम के श्यामा संग ललितादि अली ।
व्रजपुर वास शैल वन फिहरत कुंजन कुंजन रंग रली ॥ [2]
इनके लाड़ चाहु सुख सेवा भाव वेल रस फलन फली ।
कहि भगवान हित रामराय प्रभु सबन तें इनकी कृपा भली ॥ [3]
- श्री हित रामराय जी
और जिसे जो समझना हो वो समझे मुझे तो केवल इतनी ही समझ भली है कि मेरी ठाकुर नंदनंदन हैं और ठकुरानी श्री राधा महारानी हैं । [1]
श्री कृष्ण के मित्र श्रीदामा एवं अन्य ग्वालबाल हैं तथा श्री राधा की सखियाँ ललिता आदि हैं। वे ब्रज में निरन्तर निवास करते हैं और उनके साथ विभिन्न कुंजों में प्रेम क्रीड़ा करते हैं । [2]
मेरी एक ही इच्छा है कि मैं प्रिया प्रियतम को प्रेम से लाड़ लड़ाऊँ और इनकी निस्वार्थ भाव से सेवा करूं जिससे मेरी भाव रूपी बेली में फल लग सके । श्री हित रामराय जी कहते हैं, “श्री प्रिया प्रियतम जितनी कृपा करते हैं उतना तो कोई भी नहीं करता "। [3]

