रसिक दोऊ खेलन लागे होरी - श्री मुरारी दास

रसिक दोऊ खेलन लागे होरी - श्री मुरारी दास

रसिक दोऊ खेलन लागे होरी ।
उततें निकसे नन्दनन्दन, इत बरसाने की गोरी ॥ [1]
बाजत ताल मृदंग झांझ, डफ मुरली मधुर धुनि थोरी ।
गोपी वाल सबें जुर आये, भवन रह्यों नहीं कोरी ॥ [2]
स्यामा स्यामा की या छबि उपर, सब डारत तृण तोरी ।
तारी दे ललितादिक भाखत, भली बनी यह जोरी ॥ [3]
खेल मच्यौ ब्रजवीथिन महियां, कुंज कुंज वर खोरी ।
‘मुरारीदास’ प्रभु फगवा दीयौ, लोचन लगी ठगौरी ॥ [4]

- श्री मुरारी दास

आज दो रसिक होली खेल रहे हैं । उधर नंदनंदन श्री कृष्ण हैं और इधर बरसाने की गोरी श्री राधिका हैं । [1]

ताल, मृदंग, झाँझ, डफ, एवं मुरली की धीमी ध्वनि बज रही है । समस्त गोपियाँ एवं बाल बाहर आगायी हैं, कोई भी अपने घर में नहीं है । [2]

श्यामा श्याम की ऐसी मधुर छवि पर सब तृण तोड़ रही हैं । ललिता जी ताल बजा कर कहती हैं कि वाह क्या सुंदर जोड़ी है श्याम श्याम की । [3]

आज होली का खेल ब्रज की बीथियों में तथा साँकरी कुंज गलियों में रचा हुआ है । श्री मुरारी दास जी कहते हैं कि जब से मेरे प्रभु गिरिधर लाल ने मुझ पर रंग डाला है तब से मेरे नैना ठगे से रह गये हैं । [4]