कबहुँ न विछुरै जोरि यह, दम्पति जनमन चोर ।
सदा एकरस नेहमय, विहरत युगल किशोर ॥
- श्री वृंदावन देवाचार्य, गीतामृत गंगा (8.2)
यह दिव्य जोड़ी (श्री राधा-कृष्ण) एक क्षण के लिए भी बिछुड़ती नहीं है एवं सबके मन को हर लेने वाली है। यह सदा एकरस रहती है, और प्रेम में सराबोर होकर नित्य विहार में तल्लीन रहती है।
सदा एकरस नेहमय, विहरत युगल किशोर ॥
- श्री वृंदावन देवाचार्य, गीतामृत गंगा (8.2)
यह दिव्य जोड़ी (श्री राधा-कृष्ण) एक क्षण के लिए भी बिछुड़ती नहीं है एवं सबके मन को हर लेने वाली है। यह सदा एकरस रहती है, और प्रेम में सराबोर होकर नित्य विहार में तल्लीन रहती है।

