(सवैया)
कोऊ करे जप संयम नेम, तपै तप के सब देहि गमावें। [1]
कोऊ दान पुराण पढ़े सुनें, कोऊ उपासना में भरमायें॥ [2]
मैं मतिमंद न जानों कछू, श्री राधिका मोहन कार्ज बनावें। [3]
दूसरो दुवार न देखों कहूँ, जस गाये से आनंद मंगल पावें॥ [4]
- ब्रज के सवैया
कोई जप करता है, कोई संयम, नेम, तप आदि कर देह को कष्ट देता है। [1]
कोई दान करता है, कोई वेद एवं पुराणों का अध्ययन करता है, और कोई नाना प्रकार की उपासनाओं में लगा रहता है। [2]
मैं तो मतिमंद हूँ, परंतु स्वयं को बहुत भाग्यशाली मानता हूँ कि श्री राधा-कृष्ण के अतिरिक्त कुछ और जानता ही नहीं; वही मेरा सब कार्य बनाते हैं। [3]
मेरा यह अनन्य व्रत है कि श्री राधा-कृष्ण के अतिरिक्त किसी अन्य द्वार को नहीं देखूँगा (न ही ऐसे मार्ग का अनुसरण करूँगा जिसमें मैं उन्हें प्रेमपूर्वक लाड़ न लड़ा सकूँ)। मैं केवल अनन्य भाव से राधा-कृष्ण का ही यशोगान करता रहूँगा, जिससे मुझे परम आनंद एवं मंगल प्राप्त होगा। [4]
कोऊ करे जप संयम नेम, तपै तप के सब देहि गमावें। [1]
कोऊ दान पुराण पढ़े सुनें, कोऊ उपासना में भरमायें॥ [2]
मैं मतिमंद न जानों कछू, श्री राधिका मोहन कार्ज बनावें। [3]
दूसरो दुवार न देखों कहूँ, जस गाये से आनंद मंगल पावें॥ [4]
- ब्रज के सवैया
कोई जप करता है, कोई संयम, नेम, तप आदि कर देह को कष्ट देता है। [1]
कोई दान करता है, कोई वेद एवं पुराणों का अध्ययन करता है, और कोई नाना प्रकार की उपासनाओं में लगा रहता है। [2]
मैं तो मतिमंद हूँ, परंतु स्वयं को बहुत भाग्यशाली मानता हूँ कि श्री राधा-कृष्ण के अतिरिक्त कुछ और जानता ही नहीं; वही मेरा सब कार्य बनाते हैं। [3]
मेरा यह अनन्य व्रत है कि श्री राधा-कृष्ण के अतिरिक्त किसी अन्य द्वार को नहीं देखूँगा (न ही ऐसे मार्ग का अनुसरण करूँगा जिसमें मैं उन्हें प्रेमपूर्वक लाड़ न लड़ा सकूँ)। मैं केवल अनन्य भाव से राधा-कृष्ण का ही यशोगान करता रहूँगा, जिससे मुझे परम आनंद एवं मंगल प्राप्त होगा। [4]

