सेवा करत निकट रहत, मन में दूरी दुरास ।
श्रीबिहारीदास क्यौं ऊपजै, भक्ति बिना विस्वास ॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (368)
यदि कोई श्री बिहारीजी महाराज के अति निकट भी रहे और उनकी सेवा भी करता रहे, परन्तु यदि उसने मन से ही बिहारीजी से दूरी बना रखी है—अर्थात् मन में सांसारिक एवं जागतिक दुर्वासनाओं को संजोये हुए है—तो उसे श्री बिहारीजी पर पूर्ण विश्वास होगा ही नहीं, क्योंकि पूर्ण विश्वास तो एकमात्र मन-लगाकर निष्कपट एवं निष्काम भक्ति करने से ही होता है।
श्रीबिहारीदास क्यौं ऊपजै, भक्ति बिना विस्वास ॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (368)
यदि कोई श्री बिहारीजी महाराज के अति निकट भी रहे और उनकी सेवा भी करता रहे, परन्तु यदि उसने मन से ही बिहारीजी से दूरी बना रखी है—अर्थात् मन में सांसारिक एवं जागतिक दुर्वासनाओं को संजोये हुए है—तो उसे श्री बिहारीजी पर पूर्ण विश्वास होगा ही नहीं, क्योंकि पूर्ण विश्वास तो एकमात्र मन-लगाकर निष्कपट एवं निष्काम भक्ति करने से ही होता है।

