ललित नवकुंज में होरी पिया संग खेलती गोरी ।
सप्त सुर साज सब साजें बाँसुरी बीन डफ बाजैं ॥ [1]
मान भरि तान सौं गावैं रँगीले दोऊ फाग सरसावैं ।
झमकि पिचकारियाँ घालैं धाइ रोरी सौ मुख मालैं ॥ [2]
करत जब लाल बरजोरी झपटि गहि पीतपट गोरी ।
बिहँसि हँसि रंग सौं बोरी परस्पर करत झकझोरी ॥ [3]
भीजि रस रंग सुखरासी रसिकवर संग हरिदासी ।
श्रीराधाप्रसाद बलिहारी बसौं इन नैन पियप्यारी ॥ [4]
- श्री राधा प्रसाद देव जू
रमणीय कुजमहल में प्रियतम के संग प्रियाजी होली खेल रही हैं। बाँसुरी, वीणा, डफ आदि वाद्य सप्त स्वरों को साधकर बज रहे हैं । [1]
ठसक से भरे दोनों रगीले आलाप के साथ गा रहे हैं और फाग के आनन्द में उमंग पैदा कर रहे हैं, रमक-झमककर पिचकारियों से रंग बरसा रहे हैं, दौड़-दौड़कर एक-दूसरे के मुख पर रोली मल रहे हैं। [2]
जब लालजी बरजोरी करते हैं तब प्रियाजी झपटकर उनका पीताम्बर पकड़ लेती हैं और हँस-हँसकर उनको रंग से सराबोर कर देती हैं । इस प्रकार आपस में छीना-झपटी हो रही है । [3]
इस फाग लीला को देखकर नित्य सहचरी, रसिक-शिरोमणि, सुख की राशि श्रीहरिदासी जी आनन्द रस में भीग गई हैं । श्रीराधाप्रसाद जी कहते हैं कि मैं आपकी इन रसमयी लीलाओं पर बलिहारी जाता हूँ । हे प्रिया-प्रियतम, मेरे ये नेत्र आपकी इस छवि से सदा भरे रहें । [4]
सप्त सुर साज सब साजें बाँसुरी बीन डफ बाजैं ॥ [1]
मान भरि तान सौं गावैं रँगीले दोऊ फाग सरसावैं ।
झमकि पिचकारियाँ घालैं धाइ रोरी सौ मुख मालैं ॥ [2]
करत जब लाल बरजोरी झपटि गहि पीतपट गोरी ।
बिहँसि हँसि रंग सौं बोरी परस्पर करत झकझोरी ॥ [3]
भीजि रस रंग सुखरासी रसिकवर संग हरिदासी ।
श्रीराधाप्रसाद बलिहारी बसौं इन नैन पियप्यारी ॥ [4]
- श्री राधा प्रसाद देव जू
रमणीय कुजमहल में प्रियतम के संग प्रियाजी होली खेल रही हैं। बाँसुरी, वीणा, डफ आदि वाद्य सप्त स्वरों को साधकर बज रहे हैं । [1]
ठसक से भरे दोनों रगीले आलाप के साथ गा रहे हैं और फाग के आनन्द में उमंग पैदा कर रहे हैं, रमक-झमककर पिचकारियों से रंग बरसा रहे हैं, दौड़-दौड़कर एक-दूसरे के मुख पर रोली मल रहे हैं। [2]
जब लालजी बरजोरी करते हैं तब प्रियाजी झपटकर उनका पीताम्बर पकड़ लेती हैं और हँस-हँसकर उनको रंग से सराबोर कर देती हैं । इस प्रकार आपस में छीना-झपटी हो रही है । [3]
इस फाग लीला को देखकर नित्य सहचरी, रसिक-शिरोमणि, सुख की राशि श्रीहरिदासी जी आनन्द रस में भीग गई हैं । श्रीराधाप्रसाद जी कहते हैं कि मैं आपकी इन रसमयी लीलाओं पर बलिहारी जाता हूँ । हे प्रिया-प्रियतम, मेरे ये नेत्र आपकी इस छवि से सदा भरे रहें । [4]

