एक पकौरी सब जग छूट्यौ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (300)

एक पकौरी सब जग छूट्यौ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (300)

(राग गौरी)
एक पकौरी सब जग छूट्यौ  ।
जप, तप, व्रत, संजम करि हारें, नैंकु नहीं मन टूट्यौ ॥ [1]
माया रचित प्रपंच कुटुंबी, मोह-जाल सब छूट्यौ ।
व्यास गुरू हरिवंश कृपा तें, वसि वनराज प्रेम रस लूट्यौ ॥ [2]

- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (300)

इस पद में महाप्रसाद की महिमा का वर्णन करते हुए श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि जप, तप, व्रत, संयम आदि सब कुछ करके मैं हार गया, मेरा मन तनिक भी न टूटा परंतु श्री राधा वल्लभ लाल के महाप्रसाद की एक पकौड़ी ने मेरा समस्त संसार छुड़वा दिया । [1]

समस्त माया रचित प्रपंच एवं मायिक नातेदारों के मोह जाल के फंदे आदि का संपूर्ण नाश हो गया । अब श्री हरिवंश जी की कृपा से मैं वृंदावन वास कर प्रेम रस लूट रहा हूँ । [2]