वर्णाश्रम उरझे कोऊ, विधि निषेध व्रत नेम ।
नारायण बिरले लखें, जिन मिलि उपजे प्रेम ॥
- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (140)
कोई वर्णाश्रम धर्म में ही उलझे हुए हैं, कोई विधि-निषेध, व्रत-नियम के चक्करों में उलझकर समय बर्बाद कर रहे हैं, विरले ही वे सौभाग्यशाली हैं जिनके हृदय में प्रेम प्रकट हुआ है और जो श्री राधा-कृष्ण को प्रेम से लाड़ लड़ाते हैं।
नारायण बिरले लखें, जिन मिलि उपजे प्रेम ॥
- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (140)
कोई वर्णाश्रम धर्म में ही उलझे हुए हैं, कोई विधि-निषेध, व्रत-नियम के चक्करों में उलझकर समय बर्बाद कर रहे हैं, विरले ही वे सौभाग्यशाली हैं जिनके हृदय में प्रेम प्रकट हुआ है और जो श्री राधा-कृष्ण को प्रेम से लाड़ लड़ाते हैं।

