(दोहा)
ज्यौं ज्यौं चुनरि सगवगै, त्यौं त्यौं लावत हीय।
भीजत कुंजन ते दोऊ, आवत प्यारी पीय॥
(पद) [तिताल, राग मल्हार]
भीजत कुंजन ते दोउ आवत।
ज्यौं ज्यौं बूँद परत चुनरि पर, त्यौं त्यौं हरि उर लावत॥ [1]
अति गंभीर झीने मेघन की, द्रुम तर छिन विरमावत।
जै श्रीभट रसिक रस लंपट, हिलमिल हिय सचु पावत॥ [2]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (91)
(दोहा)
जब श्रीप्रिया-प्रियतम वृन्दावन के निकुंजों से आ रहे होते हैं तो मेह बरसने लगता है। जैसे-जैसे श्रीराधा की सुंदर चुनरी भींजने लगती है, वैसे-वैसे श्रीलालजी [कृष्ण] उन्हें अपने हृदय से लगा लेते हैं।
(पद)
श्री प्रिया प्रियतम भींजते हुए कुंजों से आते हैं। मेह की बूँदें जैसे जैसे श्री प्रिया जी की सुरंग चुनरी पर पड़ती हैं, तैसे तैसे श्री लालजी (वर्षा से रक्षा करने के बहाने) उन्हें अपने ह्रदय से लगा लेते हैं। [1]
मेघों की घनघोर वर्षा देखकर, (श्री लालजी श्री प्रियाजी को बचाने के हेतु) वे क्षण भर के लिए सघन वृक्ष के नीचे विश्राम करते हैं। श्रीभट्टजी कहते हैं कि रस के लोभी रसिक चूडामणि श्रीश्यामसुन्दर और परम रसभीनी श्रीश्यामाजी की जय हो ! ये युगलकिशोर (इसी प्रकार की लीला कर) परस्पर हिलमिल कर हृदय में परमानन्द प्राप्त करते हैं। [2]
ज्यौं ज्यौं चुनरि सगवगै, त्यौं त्यौं लावत हीय।
भीजत कुंजन ते दोऊ, आवत प्यारी पीय॥
(पद) [तिताल, राग मल्हार]
भीजत कुंजन ते दोउ आवत।
ज्यौं ज्यौं बूँद परत चुनरि पर, त्यौं त्यौं हरि उर लावत॥ [1]
अति गंभीर झीने मेघन की, द्रुम तर छिन विरमावत।
जै श्रीभट रसिक रस लंपट, हिलमिल हिय सचु पावत॥ [2]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (91)
(दोहा)
जब श्रीप्रिया-प्रियतम वृन्दावन के निकुंजों से आ रहे होते हैं तो मेह बरसने लगता है। जैसे-जैसे श्रीराधा की सुंदर चुनरी भींजने लगती है, वैसे-वैसे श्रीलालजी [कृष्ण] उन्हें अपने हृदय से लगा लेते हैं।
(पद)
श्री प्रिया प्रियतम भींजते हुए कुंजों से आते हैं। मेह की बूँदें जैसे जैसे श्री प्रिया जी की सुरंग चुनरी पर पड़ती हैं, तैसे तैसे श्री लालजी (वर्षा से रक्षा करने के बहाने) उन्हें अपने ह्रदय से लगा लेते हैं। [1]
मेघों की घनघोर वर्षा देखकर, (श्री लालजी श्री प्रियाजी को बचाने के हेतु) वे क्षण भर के लिए सघन वृक्ष के नीचे विश्राम करते हैं। श्रीभट्टजी कहते हैं कि रस के लोभी रसिक चूडामणि श्रीश्यामसुन्दर और परम रसभीनी श्रीश्यामाजी की जय हो ! ये युगलकिशोर (इसी प्रकार की लीला कर) परस्पर हिलमिल कर हृदय में परमानन्द प्राप्त करते हैं। [2]

