चातुरी पांच गौर सरकार ।
एक चातुरी भ्रूनर्तन की, जेहि लखि पिय बलिहार ।
एक चातुरी नैन बान की, तिरछी बरछी धार ॥ [1]
एक चातुरी मृदु बोलनि की, मोहति नंदकुमार ।
एक चातुरी केली-कला की, प्रकटति रास मझार ॥ [2]
एक हास-परिहास चातुरी, सखियन संग निहार ।
कह 'कृपालु' धरि रूप चातुरी, सेवत भानुदुलार ॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, श्री राधा त्रयोदशी (5)
गौरांगी स्वामिनी राधा पांच प्रकार की दक्षता से पूर्ण हैं। प्रथम दक्षता तो नृत्य-काल में उनके भ्रूनर्तन की है, जिसे देखकर उनके रसिक प्रियतम उन पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करते हैं। दूसरी दक्षता उनके तिरछे कटाक्षपातों की है जो प्रियतम के हृदय को घायल करने के लिए बरछी का कार्य करते हैं। [1]
तीसरी दक्षता उनकी मधुर वाणी की है जिससे मुग्ध हुए प्रियतम के श्रवण उनके मृदु वचन सुनने को सदा आतुर रहते हैं । रास-क्रीड़ा के मध्य चौथी दक्षता केली कला की है । [2]
सखियों के साथ उनके हास-परिहास की दक्षता भी देखने योग्य है। 'श्री कृपालु जी' कहते हैं कि दक्षता साकार रूप धारण कर श्री राधारानी की सेवा में रत है । [3]
एक चातुरी भ्रूनर्तन की, जेहि लखि पिय बलिहार ।
एक चातुरी नैन बान की, तिरछी बरछी धार ॥ [1]
एक चातुरी मृदु बोलनि की, मोहति नंदकुमार ।
एक चातुरी केली-कला की, प्रकटति रास मझार ॥ [2]
एक हास-परिहास चातुरी, सखियन संग निहार ।
कह 'कृपालु' धरि रूप चातुरी, सेवत भानुदुलार ॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, श्री राधा त्रयोदशी (5)
गौरांगी स्वामिनी राधा पांच प्रकार की दक्षता से पूर्ण हैं। प्रथम दक्षता तो नृत्य-काल में उनके भ्रूनर्तन की है, जिसे देखकर उनके रसिक प्रियतम उन पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करते हैं। दूसरी दक्षता उनके तिरछे कटाक्षपातों की है जो प्रियतम के हृदय को घायल करने के लिए बरछी का कार्य करते हैं। [1]
तीसरी दक्षता उनकी मधुर वाणी की है जिससे मुग्ध हुए प्रियतम के श्रवण उनके मृदु वचन सुनने को सदा आतुर रहते हैं । रास-क्रीड़ा के मध्य चौथी दक्षता केली कला की है । [2]
सखियों के साथ उनके हास-परिहास की दक्षता भी देखने योग्य है। 'श्री कृपालु जी' कहते हैं कि दक्षता साकार रूप धारण कर श्री राधारानी की सेवा में रत है । [3]

