(सवैया)
कहीं मान प्रतिष्ठा मिले न मिले, अपमान गले में बंधाना पड़े। [1]
जल भोजन की परवाह नहीं, करके ब्रत जन्म, बिताना पढ़े॥ [2]
अभिलाषा नहीं सुख की कुछ भी, दुख नित्य नवीन उठाना पढ़े। [3]
ब्रज भ्रूमि के बाहर किन्तु प्रभो, हम को कभी भूल न जाना पढ़े॥ [4]
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’
भले ही मान-सम्मान मिले अथवा अपमान ही गले लगाना पड़े, हम दोनों स्थितियों में संतुष्ट रहेंगे। [1]
हमें भोजन और जल की कोई परवाह नहीं, चाहे हमें व्रत करके ही जीवन बिताना पड़े। [2]
हमें किसी सुख की भी अभिलाषा नहीं, चाहे नित्य नवीन दुख ही क्यों न सहना पड़े। [3]
परंतु हे प्रभु! ऐसी कृपा हो कि हमें ब्रज के बाहर भूल से भी कभी न जाना पड़े। [4]
कहीं मान प्रतिष्ठा मिले न मिले, अपमान गले में बंधाना पड़े। [1]
जल भोजन की परवाह नहीं, करके ब्रत जन्म, बिताना पढ़े॥ [2]
अभिलाषा नहीं सुख की कुछ भी, दुख नित्य नवीन उठाना पढ़े। [3]
ब्रज भ्रूमि के बाहर किन्तु प्रभो, हम को कभी भूल न जाना पढ़े॥ [4]
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’
भले ही मान-सम्मान मिले अथवा अपमान ही गले लगाना पड़े, हम दोनों स्थितियों में संतुष्ट रहेंगे। [1]
हमें भोजन और जल की कोई परवाह नहीं, चाहे हमें व्रत करके ही जीवन बिताना पड़े। [2]
हमें किसी सुख की भी अभिलाषा नहीं, चाहे नित्य नवीन दुख ही क्यों न सहना पड़े। [3]
परंतु हे प्रभु! ऐसी कृपा हो कि हमें ब्रज के बाहर भूल से भी कभी न जाना पड़े। [4]

