(सवैया)
श्री हरिदास के गर्व भरे, अमनैंक अनन्य निहारिनी के।
महा-मधुरे-रस पाँन करें, अवसाँन खता सिलहारनि के॥ [1]
दियौ नहिं लेहि ते मांगहि क्यों, बरनैं गुन कौंन तिहारिनि के।
किये रहैं ऐंड बिहारी हूँ सौं, हम वेपरवाह बिहारिनी के॥ [2]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (111)
हम श्री हरिदास जी के गर्व से पूर्ण हैं और अनन्य भाव से प्रिया-प्रियतम के नित्य विहार-रस, जो महा-मधुर रस का सार है, को सतत पान करते रहते हैं। जो रसिक जन ठौर-ठौर के रस का पान कर आनंद मानते हैं, वे इस नित्यविहार रस के आनंद को देखकर औसान-ख़ता (निस्तब्ध) रह जाते हैं। [1]
प्रिया-प्रियतम के विहार-रस के अतिरिक्त यदि कोई हमें कुछ देना भी चाहे, तो हम स्वीकार नहीं करते—तो किसी से कुछ माँगने का प्रश्न ही नहीं उठता। ऐसे अनन्य रसिकों के गुणों का वर्णन कौन कर सकता है? श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि हम श्री नित्य निकुंजेश्वरी श्री राधिका महारानी की कृपा के बल से ही, उनकी बेपरवाही में, हम बिहारी जी के सामने भी ठसक किए रहते हैं। [2]
श्री हरिदास के गर्व भरे, अमनैंक अनन्य निहारिनी के।
महा-मधुरे-रस पाँन करें, अवसाँन खता सिलहारनि के॥ [1]
दियौ नहिं लेहि ते मांगहि क्यों, बरनैं गुन कौंन तिहारिनि के।
किये रहैं ऐंड बिहारी हूँ सौं, हम वेपरवाह बिहारिनी के॥ [2]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (111)
हम श्री हरिदास जी के गर्व से पूर्ण हैं और अनन्य भाव से प्रिया-प्रियतम के नित्य विहार-रस, जो महा-मधुर रस का सार है, को सतत पान करते रहते हैं। जो रसिक जन ठौर-ठौर के रस का पान कर आनंद मानते हैं, वे इस नित्यविहार रस के आनंद को देखकर औसान-ख़ता (निस्तब्ध) रह जाते हैं। [1]
प्रिया-प्रियतम के विहार-रस के अतिरिक्त यदि कोई हमें कुछ देना भी चाहे, तो हम स्वीकार नहीं करते—तो किसी से कुछ माँगने का प्रश्न ही नहीं उठता। ऐसे अनन्य रसिकों के गुणों का वर्णन कौन कर सकता है? श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि हम श्री नित्य निकुंजेश्वरी श्री राधिका महारानी की कृपा के बल से ही, उनकी बेपरवाही में, हम बिहारी जी के सामने भी ठसक किए रहते हैं। [2]

