गुरु निरमोही चाहिए, शिष्य न छाँड़ै नेह ।
बिलगाये बिलगै नहीं, एक प्राण द्वै देह ॥
- श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (21)
गुरु के कठोर या निर्मम होने पर भी शिष्य को कभी गुरु के प्रति प्रेमभाव को नहीं त्यागना चाहिए । गुरु चाहे कितना भी अलग होने का प्रयास करे, किंतु शिष्य को यही मानना चाहिए कि मेरा और गुरु जी का शरीर तो दो है परंतु प्राण तो एक (श्री प्रिया प्रियतम) ही है, इस भावना को रखते हुए गुरुजी से अलग नहीं होना चाहिए ।
बिलगाये बिलगै नहीं, एक प्राण द्वै देह ॥
- श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (21)
गुरु के कठोर या निर्मम होने पर भी शिष्य को कभी गुरु के प्रति प्रेमभाव को नहीं त्यागना चाहिए । गुरु चाहे कितना भी अलग होने का प्रयास करे, किंतु शिष्य को यही मानना चाहिए कि मेरा और गुरु जी का शरीर तो दो है परंतु प्राण तो एक (श्री प्रिया प्रियतम) ही है, इस भावना को रखते हुए गुरुजी से अलग नहीं होना चाहिए ।

