आरती मदन - गोपाल की कीजियै।
देव रिषि व्यास शुक दास सब कहत निज,
क्यौं न बिनु कष्ट रस सिंधु कौं पीजियै। [1]
अगर करि धूप कुंकुम मलय रंजित,
नव वर्तिका घृत सौं पूरि राखौ। [2]
कुसुम कृत माल नँदलाल के भाल पर,
तिलक करि प्रगट यस क्यौं न भाखौ। [3]
भोग प्रभु योग भरि थार धरि कृष्ण पै,
मुदित भुज दंड वर चँवर ढारौ। [4]
आचमन पान हित मिलित कर्पूर जल,
सुभग मुख वास, कुल ताप जारौ। [5]
शंख दुंदुभि पणव घंट कल वेणु रव,
झल्लरी सहित सुर सप्त नाचौ। [6]
मनुज तन पाइ यह दाय ब्रजराज भज,
सुखद हरिवंश प्रभु क्यौं न याँचौ। [7]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (18)
मदनगोपाल की आरती करनी चाहिये। देवऋषि नारद, वेदव्यास एवं शुकदेवजी जब विश्वास पूर्वक इस बात को कहते हैं तब (मदनगोपाल की आरती करके) बिना श्रम के रससिन्धु का पान क्यों नहीं करते ? [1]
आरती में अगर की धूप और केशर एवं चन्दन से रंजित घृत में सनी हुई नई बत्ती रखनी चाहिये। [2]
नंदलाल को पुष्पमाला धारण कराकर उनके भाल पर तिलक लगाना चाहिये और फिर उनका यशगान करना चाहिये। [3]
इसके पश्चात् प्रभु के योग्य भोग-सामग्री थाल भरकर रखनी चाहिये और हर्षित होकर भुजदण्ड से उन पर चँबर ढारना चाहिये। [4]
फिर कपूर मिश्रित जल रो प्रभु को आचमन पान कराना चाहिये और सुन्दर मुखवास (मुख शुद्धि के लिये सुगन्धित द्रव्य) अर्पित करके अपने संस्कार जनित तापों को नष्ट करना चाहिये । [5]
आरती के समय, शंख, दुंदुभी, पणव, घंट, वेणु, झल्लरी आदि के द्वारा सप्त स्वरों को ताल पूर्वक (बजाना) चाहिये। [6]
श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि मनुष्य शरीर की प्राप्ति जैसा अनुपम दाव लगने पर ब्रजराज का भजन करके सुखदाता प्रभु से अविचल सुख की याचना क्यों नहीं करते ? [7]
देव रिषि व्यास शुक दास सब कहत निज,
क्यौं न बिनु कष्ट रस सिंधु कौं पीजियै। [1]
अगर करि धूप कुंकुम मलय रंजित,
नव वर्तिका घृत सौं पूरि राखौ। [2]
कुसुम कृत माल नँदलाल के भाल पर,
तिलक करि प्रगट यस क्यौं न भाखौ। [3]
भोग प्रभु योग भरि थार धरि कृष्ण पै,
मुदित भुज दंड वर चँवर ढारौ। [4]
आचमन पान हित मिलित कर्पूर जल,
सुभग मुख वास, कुल ताप जारौ। [5]
शंख दुंदुभि पणव घंट कल वेणु रव,
झल्लरी सहित सुर सप्त नाचौ। [6]
मनुज तन पाइ यह दाय ब्रजराज भज,
सुखद हरिवंश प्रभु क्यौं न याँचौ। [7]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (18)
मदनगोपाल की आरती करनी चाहिये। देवऋषि नारद, वेदव्यास एवं शुकदेवजी जब विश्वास पूर्वक इस बात को कहते हैं तब (मदनगोपाल की आरती करके) बिना श्रम के रससिन्धु का पान क्यों नहीं करते ? [1]
आरती में अगर की धूप और केशर एवं चन्दन से रंजित घृत में सनी हुई नई बत्ती रखनी चाहिये। [2]
नंदलाल को पुष्पमाला धारण कराकर उनके भाल पर तिलक लगाना चाहिये और फिर उनका यशगान करना चाहिये। [3]
इसके पश्चात् प्रभु के योग्य भोग-सामग्री थाल भरकर रखनी चाहिये और हर्षित होकर भुजदण्ड से उन पर चँबर ढारना चाहिये। [4]
फिर कपूर मिश्रित जल रो प्रभु को आचमन पान कराना चाहिये और सुन्दर मुखवास (मुख शुद्धि के लिये सुगन्धित द्रव्य) अर्पित करके अपने संस्कार जनित तापों को नष्ट करना चाहिये । [5]
आरती के समय, शंख, दुंदुभी, पणव, घंट, वेणु, झल्लरी आदि के द्वारा सप्त स्वरों को ताल पूर्वक (बजाना) चाहिये। [6]
श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि मनुष्य शरीर की प्राप्ति जैसा अनुपम दाव लगने पर ब्रजराज का भजन करके सुखदाता प्रभु से अविचल सुख की याचना क्यों नहीं करते ? [7]

