जिनकी दया सुदृष्टि की वृष्टिहि करें निहाल  -  श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (39)

जिनकी दया सुदृष्टि की वृष्टिहि करें निहाल - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (39)

(दोहा)
जिनकी दया सुदृष्टि, की वृष्टिहि करें निहाल।
सो प्यारी मो पर ढरौ, प्रानन की प्रतिपाल॥


(पद)
प्यारी जू प्रानन की प्रतिपाल।
जिनकी दया सुदृष्टि वृष्टि करि पल में होत निहाल॥ [1]
तन मन परम पुष्ट पन पावै लावै रंग रसाल।
श्रीहरिप्रिया प्रेम रस बाढ़े काढ़े दुख ततकाल॥ [2]

- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (39)

(दोहा)
प्राणों की प्रतिपालक वह प्यारी जू मुझ पर सदा कृपा करें, जिनकी दया-दृष्टि की वृष्टि से हम सखियाँ सदा निहाल होती रहती हैं।

(पद)
हे प्यारी जू! आप मेरे प्राणों की सदा रक्षा करने वाली हैं जिनकी दया की दृष्टि की वर्षा से तत्क्षण सब निहाल हो जाते हैं। [1]

जिससे [कृपा दृष्टि से] तन-मन सब पुष्ट हो जाते हैं, और रस-रंग से रंजित हो जाते हैं। कृपा-दृष्टि से श्रीहरि एवं प्रिया का प्रेम रस बढ़ता रहता है और उसके विरह जन्य दुख निवारित हो जाते हैं वही स्वामिनि जू मुझ पर सदा कृपा करें। [2]