पिय प्यारी वृंदाविपिन, नित विहार रस एक - श्री नागरी दास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, निकुंज विलास (4)

पिय प्यारी वृंदाविपिन, नित विहार रस एक - श्री नागरी दास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, निकुंज विलास (4)

पिय प्यारी वृंदाविपिन, नित विहार रस एक ।
विछुरत नाहीं पलक हू, बीतत कलप अनेक ॥ 
- श्री नागरी दास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, निकुंज विलास (4)

श्री राधा-कृष्ण वृंदावन में सदा एकरस भाव में रहते हैं। वे अनवरत नित्य विहार में लीन रहते हैं और अनेक कल्प बीत जाने पर भी एक क्षण के लिए भी अलग नहीं होते।