(राग भैरवी)
मेरे कलिकल्मष कुल नासे,
देखि प्रवाह प्रभाकर कन्या । [1]
वह देखो पाप जात जित तित बहे,
ज्यों मृगराज देखि मृग सैन्या ॥ [2]
दै पय पान पूत लौं पौषति
जननि कृतारथ धनि बहु धन्या । [3]
दीनो चहति गदाधरजू पै,
चरन सरन अति प्रीति अनन्या ॥ [4]
- श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (19)
श्री यमुना जी का दर्शन, समस्त कलि कल्मषों का निवारक है । [1]
समस्त प्रकार के दोष इस प्रकार बह जाते हैं जैसे सिंह को देख कर हिरणों का समूह भाग जाता है । [2]
जिस प्रकार एक माता अपने पुत्र को दूध पीला कर उसे पोषित करती है उसी प्रकार धन्य है यमुना जी जो जीव को प्रिया प्रियतम का रस प्रदान कर (पुत्र की भाँति) उसे कृतार्थ करती हैं । [3]
श्री गदाधर भट्ट जी, श्री यमुना जी से श्री राधा कृष्ण के चरणों में अनन्य प्रीति की कामना कर रहे हैं । [4]
मेरे कलिकल्मष कुल नासे,
देखि प्रवाह प्रभाकर कन्या । [1]
वह देखो पाप जात जित तित बहे,
ज्यों मृगराज देखि मृग सैन्या ॥ [2]
दै पय पान पूत लौं पौषति
जननि कृतारथ धनि बहु धन्या । [3]
दीनो चहति गदाधरजू पै,
चरन सरन अति प्रीति अनन्या ॥ [4]
- श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (19)
श्री यमुना जी का दर्शन, समस्त कलि कल्मषों का निवारक है । [1]
समस्त प्रकार के दोष इस प्रकार बह जाते हैं जैसे सिंह को देख कर हिरणों का समूह भाग जाता है । [2]
जिस प्रकार एक माता अपने पुत्र को दूध पीला कर उसे पोषित करती है उसी प्रकार धन्य है यमुना जी जो जीव को प्रिया प्रियतम का रस प्रदान कर (पुत्र की भाँति) उसे कृतार्थ करती हैं । [3]
श्री गदाधर भट्ट जी, श्री यमुना जी से श्री राधा कृष्ण के चरणों में अनन्य प्रीति की कामना कर रहे हैं । [4]

