यदा तव सरोवरं सरस-भृंगसंघोल्लसत् सरोरुहकुलोज्ज्वलं मधुरवारि सम्पूरितम् ।
स्फुटत्सरसिजाक्षि हे नयनयुग्मसाक्षाद्वभौ तवैव मम लालसाऽजनि तवैव दास्ये रसे ॥
- श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (15)
हे प्रफुल्लित - कमलनयने ! जब से मैंने मधुर गुञ्जनकारी मधुकरों से शोभित, कमलसमूह से मनोहर और मधुरजल से पूर्ण आपके सरोवर ( राधाकुण्ड ) का दर्शन किया है, तब से आपके श्रीचरणों के दास्यरस में मेरी लालसा जाग उठी है ।
स्फुटत्सरसिजाक्षि हे नयनयुग्मसाक्षाद्वभौ तवैव मम लालसाऽजनि तवैव दास्ये रसे ॥
- श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (15)
हे प्रफुल्लित - कमलनयने ! जब से मैंने मधुर गुञ्जनकारी मधुकरों से शोभित, कमलसमूह से मनोहर और मधुरजल से पूर्ण आपके सरोवर ( राधाकुण्ड ) का दर्शन किया है, तब से आपके श्रीचरणों के दास्यरस में मेरी लालसा जाग उठी है ।

