गेहे निकुजं निशि संगतायाः प्रियेण तल्पे विनिवेशितायाः ।
स्वकेश वृन्दैस्तव पादपंकजं सम्मार्जयिष्यामि मुदा कदापि ॥
- श्री विट्ठलनाथ, स्वामिनी स्रोत (12)
हे स्वामिनी [राधे], ऐसा कब होगा कि जब रात्रि में निकुंज गृह में प्रियतम के साथ सुकोमल शय्या पर विराजमान, आपके चरण कमलों को मैं अपने केश समूह से प्रसन्नतापूर्वक पोंछूँगी ।
स्वकेश वृन्दैस्तव पादपंकजं सम्मार्जयिष्यामि मुदा कदापि ॥
- श्री विट्ठलनाथ, स्वामिनी स्रोत (12)
हे स्वामिनी [राधे], ऐसा कब होगा कि जब रात्रि में निकुंज गृह में प्रियतम के साथ सुकोमल शय्या पर विराजमान, आपके चरण कमलों को मैं अपने केश समूह से प्रसन्नतापूर्वक पोंछूँगी ।

