ऐसै नहीं हम चाहन हार - ब्रज के सवैया

ऐसै नहीं हम चाहन हार - ब्रज के सवैया

ऐसै नहीं हम चाहन हार, जो आज तुमें कल और कूं चाहैं। [1]
जब नैंन लगै तुम सों फिर क्यों, झूठे जग सों नैंन लगावैं॥ [2]
तुम चाहो न चाहो कुमार हमें, हम ऐसे ही नेह को नातो निभावैं। [3]
मन चातक टेक लई अब तो, घन स्वाति मिलै जब प्यास बुझावैं॥ [4]

- ब्रज के सवैया

हे श्री राधा-कृष्ण! हम ऐसे आपके प्रेमी नहीं हैं जो आज तुम्हें चाहें और कल किसी और को। [1]

जब हमारी आँखें तुमसे मिल गई हैं, तो हम इस झूठे संसार में किसी से भी अपनी आँखें क्यों मिलाएँ? [2]

हे युगल किशोर! आप भले ही हमसे प्रेम करें या न करें, लेकिन हम तो सदैव आपसे ही प्रेम करते रहेंगे। [3]

हमारे चातक रूपी हृदय की प्यास अब स्वाति की वर्षा (जो आप हैं और कोई नहीं) से ही बुझेगी। [4]