(राग देवगंधार)
श्री वृंदावन चंद बिहारी ।
अद्भुत ललित माधुरी सोहै, को सरि करै तिहारी ॥ [1]
प्रानप्रिया स्यामा सुंदरि अति, इकटक रहे निहारी ।
नव निकुंज निधिवन कौ, दृढ़पन रसिक रूप बलिहारी ॥ [2]
- श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (39)
श्री बाँके बिहारी लाल जो नित्य नयी नयी केली करने वाले ठाकुर हैं वे वृंदावन धाम के मानो चंद्रमा हैं । इनकी विलक्षण रूप माधुरी बहुत सुहावनी लगती है जिसकी उपमा अन्य किसी भी रूप से नहीं की जा सकती । [1]
प्राणों से भी अधिक प्यारी, परम सुंदरी श्री श्यामा महारानी को ललचाई आँखों से इकटक निहारा करते हैं । यह रंग महल श्री निधिवन राज से एक पल के लिए भी इधर उधर हटने की इच्छा इनके मन में नहीं होती, ऐसे रिझवार शिरोमणि श्री बिहारीजी महाराज पर रसिक जन सदा ही न्यौछवार रहते हैं । [2]
श्री वृंदावन चंद बिहारी ।
अद्भुत ललित माधुरी सोहै, को सरि करै तिहारी ॥ [1]
प्रानप्रिया स्यामा सुंदरि अति, इकटक रहे निहारी ।
नव निकुंज निधिवन कौ, दृढ़पन रसिक रूप बलिहारी ॥ [2]
- श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (39)
श्री बाँके बिहारी लाल जो नित्य नयी नयी केली करने वाले ठाकुर हैं वे वृंदावन धाम के मानो चंद्रमा हैं । इनकी विलक्षण रूप माधुरी बहुत सुहावनी लगती है जिसकी उपमा अन्य किसी भी रूप से नहीं की जा सकती । [1]
प्राणों से भी अधिक प्यारी, परम सुंदरी श्री श्यामा महारानी को ललचाई आँखों से इकटक निहारा करते हैं । यह रंग महल श्री निधिवन राज से एक पल के लिए भी इधर उधर हटने की इच्छा इनके मन में नहीं होती, ऐसे रिझवार शिरोमणि श्री बिहारीजी महाराज पर रसिक जन सदा ही न्यौछवार रहते हैं । [2]

