नवधा भक्ति निमित्त लै, जे सेबत अवतार ।
चाह मुक्ति बैकुंठ की, तिनकौ नहिं अधिकार ॥
- श्री भगवत रसिक जी, श्री भागवत रसिक जी की वाणी, श्री नित्य बिहारी जुगल ध्यान (129)
जो साधक मुक्ति, बैकुंठ‑प्राप्ति या किसी भी अन्य सिद्धि‑कामना को लक्ष्य बनाकर नवधा भक्ति का आश्रय लेते हैं और भगवान के अवतारों की उपासना करते हैं, वे इस विशुद्ध प्रेममयी रस‑उपासना के अधिकारी नहीं माने जाते।
चाह मुक्ति बैकुंठ की, तिनकौ नहिं अधिकार ॥
- श्री भगवत रसिक जी, श्री भागवत रसिक जी की वाणी, श्री नित्य बिहारी जुगल ध्यान (129)
जो साधक मुक्ति, बैकुंठ‑प्राप्ति या किसी भी अन्य सिद्धि‑कामना को लक्ष्य बनाकर नवधा भक्ति का आश्रय लेते हैं और भगवान के अवतारों की उपासना करते हैं, वे इस विशुद्ध प्रेममयी रस‑उपासना के अधिकारी नहीं माने जाते।

