(राग कान्हरो)
ऐसौ काकौ भाग जु दिन प्रति,
स्यामा स्यामहि रुचिसौं गावै । [1]
जाकी चरन सरन ह्वै रहियै,
तौ वृंदावन स्याम बसावै ॥ [2]
जूँठनि तौ ताही की खैयै,
पाप, ताप, तन दूरि नसावै । [3]
व्यास दास ताही के हूजौ,
जाहि भक्ति बिनु और न भावै ॥ [4]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (172)
वे जन परम सौभाग्यशाली होते हैं जो दिन-रात प्रेमपूर्वक जुगल किशोर श्री श्यामा श्याम की महिमा का गान करते हैं । [1]
ऐसे भक्त के चरण कमलों की शरण लेनी चाहिए, तो ही श्री श्यामसुंदर श्री वृंदावन धाम का अखंड वास प्रदान करते हैं। [2]
यदि कोई ऐसे भक्त की जूठन खाता है, तो उसके समस्त पाप और कष्ट नष्ट हो जाते हैं । [3]
श्री हरिराम व्यास कहते हैं, "श्री राधा कृष्ण की अनन्य एवं निःस्वार्थ भक्ति में लीन ऐसे सौभाग्यशाली भक्तों का सेवक बनना मेरे लिए सौभाग्य की बात है ।" [4]
ऐसौ काकौ भाग जु दिन प्रति,
स्यामा स्यामहि रुचिसौं गावै । [1]
जाकी चरन सरन ह्वै रहियै,
तौ वृंदावन स्याम बसावै ॥ [2]
जूँठनि तौ ताही की खैयै,
पाप, ताप, तन दूरि नसावै । [3]
व्यास दास ताही के हूजौ,
जाहि भक्ति बिनु और न भावै ॥ [4]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (172)
वे जन परम सौभाग्यशाली होते हैं जो दिन-रात प्रेमपूर्वक जुगल किशोर श्री श्यामा श्याम की महिमा का गान करते हैं । [1]
ऐसे भक्त के चरण कमलों की शरण लेनी चाहिए, तो ही श्री श्यामसुंदर श्री वृंदावन धाम का अखंड वास प्रदान करते हैं। [2]
यदि कोई ऐसे भक्त की जूठन खाता है, तो उसके समस्त पाप और कष्ट नष्ट हो जाते हैं । [3]
श्री हरिराम व्यास कहते हैं, "श्री राधा कृष्ण की अनन्य एवं निःस्वार्थ भक्ति में लीन ऐसे सौभाग्यशाली भक्तों का सेवक बनना मेरे लिए सौभाग्य की बात है ।" [4]

