काके द्वारा जाऊँ काकूँ बिनती सुनाऊँ वृथां,
जनम गमाऊँ क्यौं कराऊँ जग हासनी। [1]
तेरो ही कहाऊँ तोय छोड़ कहाँ अन्त जाऊँ,
सीस पद नाऊँ तू है सदां सुख रासनी॥ [2]
'लाल बलबीर' नेति नेति गुनगाऊँ मन,
मानी निधि पाऊँ तू पूजैया जन आसनी। [3]
पातक अगाधा कीये दीन सुख साधा तुही,
हरो मेरी बाधा राधा वृन्दावन बासनी॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद
मैं किसके द्वार जाऊँ और किससे व्यर्थ में विनती करूँ? आपके द्वार को छोड़कर मैं अन्यत्र क्यों भटकूँ और अपना जन्म क्यों नष्ट करूँ? जगत में उपहास क्यों कराऊँ? [1]
मैं तो केवल आपका ही हूँ। आपको छोड़कर और कहाँ जाऊँ? हे नित्य-सुख-राशि, मैं आपके चरण कमलों में प्रणाम करता हूँ। [2]
श्री लाल बलबीर कहते हैं, “मैं सदा आपके अनंत गुण गाऊँ और सबके हृदय की मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली श्री राधा से ही अपने हृदय की परम निधि को प्राप्त करूँ।” [3]
हे वृन्दावनेश्वरी श्री राधा! मैंने अनगिनत पाप किए हैं, और आप दीनों की रक्षक हैं। कृपया मेरी सभी बाधाओं को दूर कीजिए। [4]
जनम गमाऊँ क्यौं कराऊँ जग हासनी। [1]
तेरो ही कहाऊँ तोय छोड़ कहाँ अन्त जाऊँ,
सीस पद नाऊँ तू है सदां सुख रासनी॥ [2]
'लाल बलबीर' नेति नेति गुनगाऊँ मन,
मानी निधि पाऊँ तू पूजैया जन आसनी। [3]
पातक अगाधा कीये दीन सुख साधा तुही,
हरो मेरी बाधा राधा वृन्दावन बासनी॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद
मैं किसके द्वार जाऊँ और किससे व्यर्थ में विनती करूँ? आपके द्वार को छोड़कर मैं अन्यत्र क्यों भटकूँ और अपना जन्म क्यों नष्ट करूँ? जगत में उपहास क्यों कराऊँ? [1]
मैं तो केवल आपका ही हूँ। आपको छोड़कर और कहाँ जाऊँ? हे नित्य-सुख-राशि, मैं आपके चरण कमलों में प्रणाम करता हूँ। [2]
श्री लाल बलबीर कहते हैं, “मैं सदा आपके अनंत गुण गाऊँ और सबके हृदय की मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली श्री राधा से ही अपने हृदय की परम निधि को प्राप्त करूँ।” [3]
हे वृन्दावनेश्वरी श्री राधा! मैंने अनगिनत पाप किए हैं, और आप दीनों की रक्षक हैं। कृपया मेरी सभी बाधाओं को दूर कीजिए। [4]

