सहचरि पलक विसारि के, निरषै श्यामा श्याम ।
अंग अंग रस माधुरी, नैन दिये विसराम ॥
- श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्रीनिकुञ्ज प्रकाश अष्टयाम मानसी सेवा (34)
सहचरी अपनी अपलक दृष्टि से श्री श्यामा-श्याम को निहारती हैं और उनके प्रत्येक दिव्य अंग से रस-माधुरी का आनंद लेती हैं। इस प्रकार वे अपने नयन को विश्राम (आनंद) देती है।
अंग अंग रस माधुरी, नैन दिये विसराम ॥
- श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्रीनिकुञ्ज प्रकाश अष्टयाम मानसी सेवा (34)
सहचरी अपनी अपलक दृष्टि से श्री श्यामा-श्याम को निहारती हैं और उनके प्रत्येक दिव्य अंग से रस-माधुरी का आनंद लेती हैं। इस प्रकार वे अपने नयन को विश्राम (आनंद) देती है।

