आनंदनिधि तुम ही श्रीराधा - श्री वंशी अलि, श्री ललिता मंगल (5)

आनंदनिधि तुम ही श्रीराधा - श्री वंशी अलि, श्री ललिता मंगल (5)

आनंदनिधि तुम ही श्रीराधा भक्ति हित वपु द्वै धरे। [1]
निज रूप लाड़न चतुर सखी कर विपिन मन वंछित करे॥ [2]
राधा धनिक सब सखी वंदित नित्य रास प्रचारिणी। [3]
प्रेमाप्रभा की भान मूरति जयति रस उद्धारिणी॥ [4]

- श्री वंशी अलि, श्री ललिता मंगल (5)

आनंद की निधि श्री ललिता सखी श्री राधा का ही अभिन्न स्वरूप हैं जिन्होंने अपनी ही [राधा की ही] भक्ति करने के लिए दो रूप धारण किए हैं (अर्थात् श्री राधा ने स्वयं की ही सहचरी भाव से भक्ति करने के लिए अपना ललिता रूप बनाया है)। [1]

अपने ही रूप [राधा रूप] को लाड़ लड़ाने में चतुर सखी [ललिता] ने वृंदाविपिन में मनवांछित क्रीड़ा का विस्तार किया है। [2]

श्री ललिता श्री राधा रूपी ख़ज़ाने की धनी हैं, एवं सभी सखियों द्वारा परमवंदनीय हैं और नित्यरास का प्रचार करने वाली हैं। [3]

प्रेमप्रभा रूपी सूर्य की उज्ज्वल मूर्ति एवं साक्षात रस की दाता श्री ललिता जी की जै हो। [4]