(सवैया)
ऐसो कब करिहो प्रिया-प्रीतम, निशदिन टहल महल चित्त लाऊँ। [1]
सुन्दर सरस स्वरूप माधुरी, अनिमिष अचवत नैन सिराऊँ॥ [2]
नव-सत नव श्रृंगार मनोहर, सुभग अंग प्रति अंग धराऊँ। [3]
‘ललितविहारिणि' यही लालसा, सहज सनेह युगल - पद पाऊँ॥ [4]
- श्री ललित विहारिणी जी
हे प्रिया-प्रियतम! आप मेरे मन को कब ऐसा बनाएंगे कि मैं आपके निज महल में प्रेमपूर्वक और निरंतर सेवा कर सकूं? [1]
कब मेरे नेत्र आपकी अद्भुत रूप-माधुरी के मधुर रस का पान करेंगे और आपके स्वरूप को नित्य अपने नयनों में संजोए रखेंगे? [2]
ऐसा कब होगा कि नवीन सोलह श्रृंगार से विभूषित आपके सुंदर अंगों के समीप रहकर निष्काम भाव से उनकी सेवा कर पाऊं? [3]
श्री ललित विहारिणी जी कहते हैं कि मेरी एकमात्र अभिलाषा यही है कि आप मुझे अपने दिव्य चरण-कमलों के प्रति सहज प्रेम प्रदान करें। [4]
ऐसो कब करिहो प्रिया-प्रीतम, निशदिन टहल महल चित्त लाऊँ। [1]
सुन्दर सरस स्वरूप माधुरी, अनिमिष अचवत नैन सिराऊँ॥ [2]
नव-सत नव श्रृंगार मनोहर, सुभग अंग प्रति अंग धराऊँ। [3]
‘ललितविहारिणि' यही लालसा, सहज सनेह युगल - पद पाऊँ॥ [4]
- श्री ललित विहारिणी जी
हे प्रिया-प्रियतम! आप मेरे मन को कब ऐसा बनाएंगे कि मैं आपके निज महल में प्रेमपूर्वक और निरंतर सेवा कर सकूं? [1]
कब मेरे नेत्र आपकी अद्भुत रूप-माधुरी के मधुर रस का पान करेंगे और आपके स्वरूप को नित्य अपने नयनों में संजोए रखेंगे? [2]
ऐसा कब होगा कि नवीन सोलह श्रृंगार से विभूषित आपके सुंदर अंगों के समीप रहकर निष्काम भाव से उनकी सेवा कर पाऊं? [3]
श्री ललित विहारिणी जी कहते हैं कि मेरी एकमात्र अभिलाषा यही है कि आप मुझे अपने दिव्य चरण-कमलों के प्रति सहज प्रेम प्रदान करें। [4]

