सदा श्याम-श्यामा पुकारा करेंगे ।
नवल रूप निशि दिन निहारा करेंगे ॥ [1]
यमुना तट लता कुञ्ज ब्रज बीथियों में ।
विचर कर ये जीवन गुजारा करेंगे ॥ [2]
मिलेगी जो रसिया की जूठन प्रसादी ।
वही जीविका का सहारा करेंगे ॥ [3]
बसेंगे करीलों में काँटों में हरदम ।
जरात कंटकों से किनारा करेंगे ॥ [4]
जो दृग ‘बिन्दु’ से पाँव धोया करेंगे ।
तो पलकों से पथ को बुहारा करेंगे ॥ [5]
- श्री बिंदु जी, मोहन मोहिनी
हम सदा श्याम श्यामा पुकारा करेंगें और उनका नित्य नवल रूप निशिदिन निहारा करेंगें । [1]
यमुना तट में सदा ब्रज की कुंजों में विचरते हुए ही अपने जीवन को सदा गुज़ारेंगें । [2]
जो भी रसिया की जूठन प्रसादी मिलेगी उसी को ही जीवन का एक मात्र सहारा बनाएंगें । [3]
हम सदा करीलों एवं काँटों में बसने के लिए भी इच्छुक हैं परंतु संसारी मोह रूपी काँटें जो ह्रदय को जलाते हैं, उनसे सदा किनारा करेंगें । [4]
हम सदा दिव्य श्यामा श्याम के चरणों को अपने आंसुओं से धोया करेंगें और उन्हीं पलकों से उनके पथ को सदा बुहारा [झाड़ू लगाना] करेंगें । [5]
नवल रूप निशि दिन निहारा करेंगे ॥ [1]
यमुना तट लता कुञ्ज ब्रज बीथियों में ।
विचर कर ये जीवन गुजारा करेंगे ॥ [2]
मिलेगी जो रसिया की जूठन प्रसादी ।
वही जीविका का सहारा करेंगे ॥ [3]
बसेंगे करीलों में काँटों में हरदम ।
जरात कंटकों से किनारा करेंगे ॥ [4]
जो दृग ‘बिन्दु’ से पाँव धोया करेंगे ।
तो पलकों से पथ को बुहारा करेंगे ॥ [5]
- श्री बिंदु जी, मोहन मोहिनी
हम सदा श्याम श्यामा पुकारा करेंगें और उनका नित्य नवल रूप निशिदिन निहारा करेंगें । [1]
यमुना तट में सदा ब्रज की कुंजों में विचरते हुए ही अपने जीवन को सदा गुज़ारेंगें । [2]
जो भी रसिया की जूठन प्रसादी मिलेगी उसी को ही जीवन का एक मात्र सहारा बनाएंगें । [3]
हम सदा करीलों एवं काँटों में बसने के लिए भी इच्छुक हैं परंतु संसारी मोह रूपी काँटें जो ह्रदय को जलाते हैं, उनसे सदा किनारा करेंगें । [4]
हम सदा दिव्य श्यामा श्याम के चरणों को अपने आंसुओं से धोया करेंगें और उन्हीं पलकों से उनके पथ को सदा बुहारा [झाड़ू लगाना] करेंगें । [5]

