आप कहावत रसिक कृपन मति - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी (9)

आप कहावत रसिक कृपन मति - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी (9)

आप कहावत रसिक कृपन मति, कायर मत्सर लोभ लिवास ।
ठग बग डिंभी कपट प्रेम बिन, तिनहि न मन विस्वास ॥

- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी (9)

कुछ लोग संसार में स्वयं को रसिक कहलाते हैं, पर उनकी मति एवं सिद्धांत कृपणता से भरा होता है। वे कर्म, धर्म, विधि, निषेध के चक्करों में फँसे रहते हैं और कायर की भाँति सांसारिक राग-द्वेष और मिथ्या भोग विलास नहीं छोड़ पाते। ऐसे लोग बगुला भक्त के समान ठग होते हैं, जिनका हृदय प्रेम से अछूता रहता है और बाहरी वेशभूषा बनाकर दूसरों को ठगते हैं, इसलिए उनके हृदय में प्रिया-प्रियतम के प्रति अटूट विश्वास नहीं उत्पन्न होता।