श्री सहचरिशरण देव जी की जीवनी

श्री सहचरिशरण देव जी की जीवनी

जन्म :
श्री सहचरीशरण देव जी का जन्म 1773 में कश्मीर के अवन्तिपुरी में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था । इनका नाम सखाराम था । इनके पिता का नाम सिखरराम था । ये देवी के उपासक थे एवं उन्हें अनेक सिद्धियां प्राप्त थी । इनका घर देवी के मंदिर के निकट ही था । कुछ काल के उपरान्त समस्त परिवार कश्मीर से पंजाब आ गया और वहीँ निवास करने लगे ।

बाल्यकाल :
बाल्यकाल से ही सखाराम जी तीव्र बुद्धि संपन्न थे । अनेक प्रकार की सिद्धियों की झलक इनकी देह में होती थी । दूसरे बालकों के संग खेलते हुए सखाराम कभी-कभी सहज ही निकट भविष्य में होने वाली घटना बता देते थे, और ऐसा ही होता था । सबलोग आश्चर्यचकित हो जाते थे ।

जब सखाराम 7-8 वर्ष के थे तब इनकी माता का देहांत हो गया । पिता अधिकतर देवी की उपासना में लीन रहते थे । सखाराम यहाँ-वहाँ घूमते रहते । 
एक दिन एक विचित्र घटना घटी । जब सखाराम सो रहे थे तब उन्हें स्वप्न में देवी के दर्शन हुए । यह दर्शन बड़ा भयावह था । इसके बाद सखाराम ने यह निश्चय किया कि आगे से मैं कभी देवी के मंदिर में नहीं जाऊँगा । लेकिन उनके पिता देवी-उपासना में ही डूबे रहते । इससे सखाराम को पिता से चिढ़ हो गयी, के ये देवी की उपासना क्यों करते हैं । 

वृन्दावन आगमन एवं दीक्षा :
जब सखाराम 10 वर्ष के थे तब कुछ साधुओं की जमात के संग ही घर से चल पड़े, बिना किसी को कुछ बताये । साधुओं की जमात जब कहीं विश्राम के लिए रूकती तो वहां कथा-वार्ता होती, जो सखाराम प्रेम से सुनते । बाकि समय वे कहीं चले जाते एवं एकांत रहते । जब साधुगण चलने लगते तब सखाराम भी साथ चलने लगते । अंत में साधुगण वृन्दावन पहुँचे एवं उनके संग सखाराम भी आ गए । अब यहाँ साधुओं ने विचार किया की यहाँ कोई कश्मीरी साधु मिल जाये तो सखाराम को उनके साथ कर दें । एक कश्मीरी साधु मिले तो सखाराम को साधुओं की जमात ने कश्मीरी साधु को सौंप दिया और आगे बढ़ गए । वे कश्मीरी साधु सखाराम को लेकर टटिया स्थान में श्री ललितमोहिनी देव जी के सम्मुख उपस्थित हुए । 
श्री ललितमोहिनी देव जी ने बालक सखाराम से कुछ वार्ता की । इस वार्ता से श्री ललितमोहिनी देव जी ने बालक सखाराम की बुद्धि एवं निष्ठा का परिचय ले लिया । बालक सखाराम की आयु उस समय 11 वर्ष की थी । श्री ललितमोहिनी देव जी ने उचित समझकर बालक सखाराम को श्री राधाशरण देव जी को सौंप दिया एवं दीक्षित करने का आदेश दिया । श्री ललितमोहिनी देव जी ने कहा "देखो, एक और छोटी सखी आयी है, इसे अपना शिष्य कर लो, यह तो सखी है ।" 
श्री राधाशरण देव जी ने 1784 में सखाराम को दीक्षा प्रदान की एवं नाम रखा सहचरीशरण । 

टटिया स्थान के महन्त पद पर प्रतिष्ठित होना :
श्री ललितमोहिनी देव जी के निकुंजगमन के पश्चात् उनके शिष्य श्री चतुरदास जी टटिया स्थान के महन्त पद पर प्रतिष्ठित हुए । श्री चतुरदास के उपरान्त श्री ठाकुरदास जी महंत हुए । 
श्री सहचरीशरण अपने गुरू श्री राधिकादास जी के गद्दी पर विराजने से प्रथम उनके संग ही बुन्देलखण्ड में भ्रमण करते थे । जब श्री वृन्दावन में इनके गुरुभ्राता महन्त श्री ठाकुरदास जी निकुञ्ज पधारे तो श्री राधिकादास जी को श्री वृन्दावन आने के लिये उनके पास पत्र गया । तब श्री राधिकादास जी, श्री सहचरिशरण जी को पायोनियरगढ़ में ही रहने के लिये आज्ञा देकर चले आये; जिसके विषय में इन्होंने लिखा है :-

"सुठि स्थान माहिं मोहि राख्यो; साधौ याहि चैन मृदु भाख्यो ।
दासगरीब, गुपाल, दामोदर, रहे पास अनुकूल प्रमुदकर ॥ "

अतएव श्री राधिकादास जी, श्री सम्पतिशरण और श्री दम्पतिशरण नामक शिष्यों को, जिसपर विशेष कृपादृष्टि थी : संग में लेकर श्रीवृन्दावन आ गये । श्री राधिकादास जी वृन्दावन में 1811 से 1821 तक टटिया स्थान की गद्दी पर विराजने के पश्चात् निकुञ्ज को पधारे तो दम्पति और सम्पत्ति शरण ने श्री सहचरिशरण जी को वृन्दावन आने के लिये पत्र दिया जिसमें उन्होंने अपने महान्-शोक को भी प्रगट किया था । श्री सहचरिशरण जी को विशेषतः उनके अपार दुःख पर अत्यन्त शोक हुआ । उसी क्षण वृन्दावन के लिये प्रस्थान हो गये । इन्होंने उस पत्र के विषय में इस प्रकार लिखा है -

विरह निकेत पुनिपत्रिका लिखीजु जिनि दीन्हीं सो हमारे पास आतुर पठाय के ;
बाँचत ही गुरुके वियोग शोक भूलि गयो संपति औ दंपति को दुख रह्यो छायके ।
आपो मै उताल दोउ दौरि के रसालमिले कीन्ही है प्रणाम नवनेह उफनोय के ;
बाबाजू के चरित्र विचित्र बहु भाँति कह्यो सुनिके सुहायो मन राख्यो हैं वसायके ॥

श्रीवृन्दावनवासी सन्त महन्तादिक आदि वैष्णवों ने श्री सहचरिशरण जी को योग्य देखकर टटिया स्थान के आचार्य-गद्दीपर प्रतिष्ठित किया । जिसके विषय में इन्होंने स्वयं लिखा है -

सन्त महन्त कृपा करिके गहिवाँही । मोहि न दीन्हों जान राखि लीन्हों वन माहीं॥
ममअवगुनतजिअमितवरासनपर बैठार्यो । जिमिसुकलापीपक्षपातहरिशिरपरधार्यो ॥

ग्रन्थ रचना :
श्री सहचरिशरण जी ने दो ग्रंथ निर्माण किये हैं जो टटिया स्थान से प्रकाशित भी हो चुके हैं: वे 'ललितप्रकाश' और 'सरसमंजावली' हैं।
ललित-प्रकाश में स्वामी श्रीहरिदासजी से लेकर श्रीललितमोहिनीदासजी पर्यन्त आचार्यों का संक्षिप्त चरित्र विविध प्रकार के ललित-छन्दों में वर्णन हैं । यह ग्रन्थ स्वपूर्वाचार्यगौरवाभिमान से परिपूर्ण है । इसमें टटिया-स्थान के आचार्यपादों के सिद्धान्त, अकथनीय-- आत्मशक्ति, उनके द्वारा धर्म-प्रचार, बढ़े बढ़े बादशाह एवं शासकों के प्रति चमत्कार प्रदर्शन एवं उपासना महत्व प्रभृति का बहुत ही विशद्रूप से लक्षित छन्दों में वर्णन है ।
इस ग्रन्थ की रचना श्रीकिशोरदासजी द्वारा निर्मित निजमतसिद्धान्त के आधार पर हुई है । रीति और भाषा महाकवि केशवदास निर्मित श्रीरामचन्द्रिका के समान है । इस ग्रन्थ के पठनपाठन से आचार्य चरणाश्रितों को भजनानंद के संग ही काव्यानंद का विलक्षण ढंग से आस्वादन अनुभव होता है । यह ग्रन्थ स्थानीय साहित्य-सिन्धु के उत्थान में एक शसक्त सामिग्री है । जो वैष्णव साहित्य के गौरव की विशेषता वर्द्धक है । 
सरसमंजावली में 140 मांझ हैं । इसकी कविता बहुत ही अच्छी है । इसके विषय में श्रीवियोगी हरिजी का मत है - “ इसकी रचना बड़ी ही उच्च कोटि की है । काव्य चमत्कार के साथ साथही इसमें प्रेम-माधुरी और रसिकवारुणी की एक निराली छटा और मादकता है । इसकी भाषा भी एक अनूठे ढंग की है । व्रजभाषा, खड़ीबोली, पंजाबी और फारसी का उसमें बड़ा ही मधुर मिश्रण हुआ है । कोई कोई छन्द तो 'तीर, तलवार और तमंचा' का काम कर जाता है । हमारी राय में तो सहृदयजन सरसमंजावली को न केवल कंठाभरन या हृदयाभरन ही बनायें, वरन उसे रसिक-समाज की गीता मानकर उसका नित्य-पारायण किया करें ।"

श्री सहचरीशरण जी द्वारा प्रेम-स्थिति का वर्णन :

बिन हथियार करत उर घायल समर बावरे भैना,
अति इरषैल मदन पुनि तापर दई बांक करि सैना,
इक बंदूक चढ़ी जिमि बाजी तासौं कोउ बचै ना,
सहचरिशरण रसिक आशिक कों इमि महबब बदै ना ॥
- सरसमंजावली (112)

श्री कृष्ण बिना हथियार के ही ह्रदय को घायल कर देते हैं और प्रेमी यहाँ-वहाँ भटकता रहता है । इसके बाद भी परम ईर्ष्यायुक्त श्री कृष्ण अपने नेत्रों से कटाक्ष करते हैं । बंदूक के निशाने पर आ जाने के बाद कौन बच पाया है । श्री सहचरीशरण जी कहते हैं कि रसिक-मार्ग में यूँ ही किसी आशिक को प्रेमी नहीं कहते ।

श्री सहचरीशरण जी द्वारा श्री कृष्ण-छवि का वर्णन :

नासावर मुक्ता विशाल जनु जानि सुराही राखें ।
मुख-छबि अधिक वारुणी भरि भरि पल-प्याले बिच नाखें ॥
सहचरिशरण सुझूमत घूमत करत पान अभिलाखें ।
ऐ महबूबां श्याम सुखूबां कृत मतवाली आंखें ॥
- सरसमंजावली (23)

श्री सहचरीशरण जी कहते हैं कि "श्री श्यामसुन्दर की नासिका में विशाल मुक्ता सुशोभित है जो सुराही की भांति प्रतीत होती है । उनके मुख-छवि का मधुर रस, जो वारुणी के समान है, उसी सुराही में भरी है, जिसका मैं प्याला भर-भर कर पान कर झूमते हुए घूमता हूँ एवं मेरे नेत्र श्री श्यामसुंदर की रूप माधुरी में मतवाली हुए रहते हैं ।"

बाँकी पाग, चन्द्रिका, तापर तुर्रा रुरकि रहा है ।
वर सिरपंच, माल उर बांकी, पट की चटक अहा है ॥
बाँके नैन, मैन-सर बाँके, बैन-विनोद महा है ।
बाँके की बाँकी झाँकी करि, बाकी रही कहा है ॥
- सरसमंजावली (29)

अनंत-अनंत सौंदर्य-माधुर्य-निधि ठाकुर श्रीबांकेबिहारीजी महाराज के सिर पर बंधी टेडी पाग सुशोभित हो रही है। पाग पर चन्द्रिका और तिरछे लगे तुर्रे की शोभा बड़ी ही निराली है। सुन्दर सुसज्जित सिरपंच और उर-स्थल पर ढुलक रही वनमाला का बाँकपन तथा अंग अंग में धारण किये वस्त्रों की अद्भुत चटक को देख-देखकर मन मुग्ध हो रहा है। कामदेव के विषम वाणों को तिरस्कृत करने वाले रत नारे नेत्रों से कटाक्षों की वर्षा हो रही है। अरुणाभ अधरों से वचन माधुरी का अमृत रस झर रहा है। ऐसे अद्भुत ठाकुर की दिव्यातिदिव्य विशुद्ध रसमयी बाँकी झाँकी का दर्शन कर लेने पर भी कुछ करना शेष रह जाता है, यह हम नहीं जानते। 

श्री सहचरीशरण जी द्वारा निरंतर भक्ति के उपदेश की एक झलक:

हर दम याद किया कर हरि की, दरद निदान हरैगा ।
मेरा कहा न खाली ऐ दिल ! आनँद कंद ढरैगा ॥ 
ऐसा नहीं जहाँ बिच कोई, लंगर लोग लरैगा ।
सहचरिशरण शेर दा बच्चा, क्या गजराज करैगा ॥ 
- सरसमंजावली (8)

हे मन, प्रत्येक क्षण तू श्री हरि का स्मरण किया कर, तेरे दुःख को वे हर लेंगे । मेरा कहा असत्य नहीं होगा, आनँदकंद श्री कृष्ण अवश्य तुझपर कृपा करेंगे । संसार में ऐसा कोई नहीं है जो तेरे मार्ग में बाधा दे सके । श्री सहचरिशरण जी कहते हैं कि तू शेर (श्री कृष्ण) का बच्चा (दास) है, गजराज (मायिक जगत) तेरा क्या बिगाड़ सकता है ? 

निकुंज गमन :
श्री सहचरिशरण जी 16 वर्ष तक टटिया स्थान की गद्दी को सुशोभित करके 1827 में निकुंज को पधारे ।