व्यास न साधन और सब, हरि सेवा समतूल ।
पत्रनि-पत्रनि जल भिदै, सींचत तरुवर मूल ॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (91)
श्री हरि की निष्काम सेवा ही सभी साधनों का सार है। जैसे वृक्ष की जड़ में जल देने से समस्त पत्ते-पुष्प तृप्त हो जाते हैं, वैसे ही हरि-सेवा से सभी आध्यात्मिक साधन स्वतः सिद्ध हो जाते हैं।
पत्रनि-पत्रनि जल भिदै, सींचत तरुवर मूल ॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (91)
श्री हरि की निष्काम सेवा ही सभी साधनों का सार है। जैसे वृक्ष की जड़ में जल देने से समस्त पत्ते-पुष्प तृप्त हो जाते हैं, वैसे ही हरि-सेवा से सभी आध्यात्मिक साधन स्वतः सिद्ध हो जाते हैं।

