चाहौं नहिं प्रसन्न कियो इन्द्र सुरराज जो है,
विधिहू न चाहौं प्रसन्न देवी को विचारी है। [1]
चाहौं नहिं प्रसन्न कियो रिधि सिधि लच्छमी हूँ,
मुक्तिहू न चाहौं जो सकल सुखकारी है॥ [2]
चाहौं नहिं प्रसन्न कियो आदि वैकुण्ठनाथ,
तीन लोक मांझ गति जाकी प्रति भारी है। [3]
श्रीगुरु कृपा सों कहौं जन्म-जन्म मोपैं सदा,
भक्तजन प्रसन्न रहो यही चाह धारी है॥ [4]
- श्री सुंदरी कुंवरी जी
न ही मैं स्वर्ग के देवराज इन्द्र को प्रसन्न करना चाहता हूँ; न ही मैं भगवान ब्रह्मा और किसी अन्य देवी को प्रसन्न करना चाहता हूँ। [1]
न ही मैं रिद्धि, सिद्धि और लक्ष्मीजी को प्रसन्न करना चाहता हूँ; न ही मैं मोक्ष प्राप्त करना चाहता हूँ जो परमसुख देने वाला है। [2]
न ही मैं वैकुण्ठनाथ भगवान विष्णु को प्रसन्न करना चाहता हूँ, जिनकी गति तीनों लोकों में परम दुर्लभ है। [3]
श्री सद्गुरु की कृपा से मैं यह कहती हूँ कि प्रत्येक जन्म में मुझपर प्रिया प्रियतम (श्री राधा कृष्ण) के भक्तगण सदा प्रसन्न रहें, यही मेरी एकमात्र अभिलाषा है। [4]
विधिहू न चाहौं प्रसन्न देवी को विचारी है। [1]
चाहौं नहिं प्रसन्न कियो रिधि सिधि लच्छमी हूँ,
मुक्तिहू न चाहौं जो सकल सुखकारी है॥ [2]
चाहौं नहिं प्रसन्न कियो आदि वैकुण्ठनाथ,
तीन लोक मांझ गति जाकी प्रति भारी है। [3]
श्रीगुरु कृपा सों कहौं जन्म-जन्म मोपैं सदा,
भक्तजन प्रसन्न रहो यही चाह धारी है॥ [4]
- श्री सुंदरी कुंवरी जी
न ही मैं स्वर्ग के देवराज इन्द्र को प्रसन्न करना चाहता हूँ; न ही मैं भगवान ब्रह्मा और किसी अन्य देवी को प्रसन्न करना चाहता हूँ। [1]
न ही मैं रिद्धि, सिद्धि और लक्ष्मीजी को प्रसन्न करना चाहता हूँ; न ही मैं मोक्ष प्राप्त करना चाहता हूँ जो परमसुख देने वाला है। [2]
न ही मैं वैकुण्ठनाथ भगवान विष्णु को प्रसन्न करना चाहता हूँ, जिनकी गति तीनों लोकों में परम दुर्लभ है। [3]
श्री सद्गुरु की कृपा से मैं यह कहती हूँ कि प्रत्येक जन्म में मुझपर प्रिया प्रियतम (श्री राधा कृष्ण) के भक्तगण सदा प्रसन्न रहें, यही मेरी एकमात्र अभिलाषा है। [4]

