(राग खम्माच)
हे स्वामिनि हर्षामिनि भामिनि अब मेरी सुधि लीजै ।
हा हा करी बिगाड़ भाँति बहु भूल माफ कर दीजै ॥ [1]
दीन टेर सुनि देखि गरीबी ज्यौं त्यों ही अपनीजै ।
ललित लड़ैती श्री वृन्दावन रज अधिकारी कीजै ॥ [2]
- श्री ललित लड़ैती जी, श्री किशोरी करुणा कटाक्ष, विनय (25)
हे स्वामिनी श्री राधा, अब मेरी भी सुधि ले लीजिए । मैंने अपना बहुत-भाँति से बिगाड़ कर लिया है, मेरी भूल को क्षमा कीजिये । [1]
श्री ललित लड़ैती जी कहते हैं, हे स्वामिनी, आप ही सांची दीनबंधु ही अत: मुझ दीन की पुकार सुनकर जैसे-तैसे मुझे अपना बना लीजिए और अपने निज धाम श्री वृन्दावन का अखण्ड वास प्रदान कीजिये ।" [2]
हे स्वामिनि हर्षामिनि भामिनि अब मेरी सुधि लीजै ।
हा हा करी बिगाड़ भाँति बहु भूल माफ कर दीजै ॥ [1]
दीन टेर सुनि देखि गरीबी ज्यौं त्यों ही अपनीजै ।
ललित लड़ैती श्री वृन्दावन रज अधिकारी कीजै ॥ [2]
- श्री ललित लड़ैती जी, श्री किशोरी करुणा कटाक्ष, विनय (25)
हे स्वामिनी श्री राधा, अब मेरी भी सुधि ले लीजिए । मैंने अपना बहुत-भाँति से बिगाड़ कर लिया है, मेरी भूल को क्षमा कीजिये । [1]
श्री ललित लड़ैती जी कहते हैं, हे स्वामिनी, आप ही सांची दीनबंधु ही अत: मुझ दीन की पुकार सुनकर जैसे-तैसे मुझे अपना बना लीजिए और अपने निज धाम श्री वृन्दावन का अखण्ड वास प्रदान कीजिये ।" [2]

