जलबिहार ते आदि सुष, सषियन के ही हेत - श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (12)

जलबिहार ते आदि सुष, सषियन के ही हेत - श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (12)

जलबिहार ते आदि सुष, सषियन के ही हेत ।
सखिजन अपने भाव करि, ताही में सब लेत ॥

- श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (12)

श्री राधा विविध लीलाएँ, जैसे जल-विहार आदि, अपनी सखियों के आनंद के लिए करती हैं। प्रत्येक सखी अपने विशिष्ट भाव के अनुसार उस लीला-रस का आस्वादन करती है।