श्री नन्दगाँव के चरण पहाड़ी (नंदीश्वर पर्वत) पर श्रीकृष्ण के चरण चिन्ह अंकित हैं । गोचारण के समय श्री कृष्ण ने लक्ष-लक्ष गायों को एकत्रित करने के लिए इस नंदीश्वर पर्वत के ऊपर चढ़ कर वंशी वादन किया था । वंशी के करुण और मधुर स्वरसे इस पर्वत की शिलायें गल गई तथा कृष्ण के श्रीचरणों के चिह्न यहाँ पर अंकित हो गये । यह देख भगवान शिव प्रसन्न हो गए और श्री कृष्ण से कहा "हे प्रभु, मैं धन्य हो गया, आपके यह चरण चिन्ह अनंतकाल तक इसी प्रकार विराजमान रहेंगे ।"
यहाँ के चरण चिन्हों का प्रसंग श्रीमद्भागवत् में दो बार आया है, पहला प्रसंग अक्रूर जी के आगमन पर है, दूसरा उद्धव जी के आगमन पर ।
परमभक्त अक्रूर जी जब कंस के आदेश से श्री कृष्ण और बलराम को ले जाने के लिए मथुरा से नन्दगाँव आ रहे थे, तब नन्दगाँव के निकट पहुँचने पर यहाँ पहाड़ी के ऊपर तथा आसपास सर्वत्र ही श्री कृष्ण के चरण - चिह्नों का दर्शन हुआ था । वे भूमि में अंकित चरणों में लोट-पोट कर भाव विह्वल होकर रोदन करने लगे । आज भी भक्तलोग श्रीकृष्ण के चरण - चिह्नों को देखकर भावविह्वल हो जाते हैं ।
इति सञ्चिन्तयन् कृष्णं श्वफल्कतनयोऽध्वनि ।
रथेन गोकुलं प्राप्तः सूर्यश्वास्तगिरि नृप ॥
- श्रीमद्भागवत (10.38.24)
"मार्ग में श्रीकृष्ण चिन्तन करते हुए, रथ के द्वारा संध्या के समय अक्रूर जी गोकुल पहुँचे ।"
गोकुल शब्द वैसे सारे ब्रज के लिए प्रयुक्त हुआ है, किन्तु यहाँ इसका भाव नन्दगाँव से है । कहीं वृन्दावन कहीं ब्रज या कहीं सारा ब्रज ही गोकुल नाम से लक्षित है ।
पदानि तस्याखिललोकपाल किरीटजुष्टामलपादरेणोः ।
ददर्श गोष्ठे क्षितिकौतुकानि विलक्षितान्यञ्जयवांकुशाद्यैः ॥
- श्रीमद्भागवत (10.38.25)
"नन्दगाँव पहुँच कर के अक्रूर जी ने चरण चिन्ह देखे । अक्रूर जी ने कमल, यव आदि चिन्हों से अंकित लोकपाल पूजित चरण चिन्ह देखे ।"
इसके बाद दूसरा प्रसंग उद्धव जी से ब्रजदेवियों के मिलन पर हैं ।
पुनः पुनः स्मारयन्ति नन्दगोपसुतं बत ।
श्री निकेतैस्तत्पदकैर्विस्मर्तुं नैव शक्नुमः ॥
- श्रीमद्भागवत (10.47.50)
ब्रजगोपियाँ कहती हैं – “उद्धव जी ! श्रीकृष्ण के चरण चिन्हों से अंकित यह ब्रजभूमि उनकी मधुर छवि हमारे सामने प्रत्यक्ष कर देती है । हम इन चिन्हों को देखकर उन्हें कैसे भूल सकती हैं?”
इन दोनों प्रसंगों में यही बात स्पष्ट होती है कि चाहे अक्रूर जी हों, उद्धव जी हों, चाहे ब्रजवासी अथवा गोपीजन हों वे सभी सम्पूर्ण ब्रजभूमि को श्री चरणों से अंकित देखते हैं क्योंकि वे चरण ब्रजभूमि के रसपोषक एवं श्री वर्धक हैं । श्रीमद्भागवत (10.35.6) में द्रष्टव्य है किन्तु जो चिन्ह उन्होंने देखे, वो हम मलिन अंतःकरण से नहीं देख सकते हैं ।
स्थान :
नन्दगाँव के पश्चिम में श्री नंदबाबा मंदिर से 1.5 km की दुरी पर चरणपहाड़ी स्थित है ।

