प्रेम अटपटी बात कछु - श्री माधुरी दास जी, वंशीवट माधुरी (246)

प्रेम अटपटी बात कछु - श्री माधुरी दास जी, वंशीवट माधुरी (246)

प्रेम अटपटी बात कछु, कहत बनें नहीं बैन ।
कै जाने मन की दशा, कै नेही के नैंन ॥
- श्री माधुरी दास जी, वंशीवट माधुरी (246)

विशुद्ध प्रेम की अनुभूति शब्दों की सीमा से परे है। उसे न तो वाणी पूर्णतः व्यक्त कर सकती है और न तर्क समझा सकता है। इस प्रेम की वास्तविक स्थिति या तो प्रेम में डूबे हुए व्यक्ति का मन जानता है या प्रेमी की आँखों से ही झलकता है।