(राग केदारौ)
अद्भुत गति उपजति अति नृत्तत
दोऊ मंडल कुँवर किसोरी । [1]
सकल सुधंग अंग भरि भोरी पिय नृत्तत
मुसिकनि मुख मोरी परिरंभन रस रोरी ॥ [2]
ताल धरैं बनिता मृदंग चंद्रागति
घात बजै थोरी थोरी । [3]
सप्त भाइ भाषा बिचित्र
ललिता गायनि चित चोरी ॥ [4]
श्रीबृन्दाबन फूलनि फूल्यौ पूरन ससि
त्रिबिध पवन बहै थोरी थोरी । [5]
गति बिलास रस हास परस्पर भूतल अद्भुत जोरी ॥ [6]
श्रीजमुना जल बिथकित पुहुपनि बरषा
रतिपति डारत त्रिन तोरी । [7]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी
कौ रस रसना कहै को री ॥ [8]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (33)
मंडलाकार सखियों के मध्य श्री श्यामा-श्याम नृत्य कर रहे हैं जिससे अद्भुत गति प्रकट हो रही है । [1]
भोरी श्री राधा एवं श्याम सुंदर अंग-से-अंग मिलाकर सुधंग नृत्य कर रहे हैं, मुख मोड़ कर मुस्कुरा रहे हैं एवं आलिंगन कर रहे हैं जिससे रस प्रकट हो रहा है । [2]
सखी मृदंग बजा रही है, उसपर धीमी घात लगाकर ताल बंधा रही है । [3]
श्री ललिता जू विचित्र बाषा एवं सप्त सुरों में मधुर गान कर चित्त का आकर्षण कर रही हैं । [4]
श्री वृन्दावन खिले हुए पुष्पों से आच्छादित है, आकाश में पूर्ण चंद्र हैं एवं मंद-सुगंध सहित धीमी पवन बह रही है । [5]
नृत्य में गति-विलास एवं परस्पर में हास-परिहास करते हुए भूतल पर यह अद्भुत जोरी प्रकट हुई है । [6]
श्री यमुना जी का जल थकित हो गया है, आकाश से पुष्पों की वर्षा हो रही है एवं कामदेव इस सुन्दर जोरी पर तृण तोड़ रहे हैं अर्थात स्वयं को न्योंछावर कर रहे हैं । [7]
स्वामी श्री हरिदास जी के स्वामी श्री श्यामा-कुंजबिहारी के इस अद्भुत रस का वर्णन कौन कर सकता है ? [8]
अद्भुत गति उपजति अति नृत्तत
दोऊ मंडल कुँवर किसोरी । [1]
सकल सुधंग अंग भरि भोरी पिय नृत्तत
मुसिकनि मुख मोरी परिरंभन रस रोरी ॥ [2]
ताल धरैं बनिता मृदंग चंद्रागति
घात बजै थोरी थोरी । [3]
सप्त भाइ भाषा बिचित्र
ललिता गायनि चित चोरी ॥ [4]
श्रीबृन्दाबन फूलनि फूल्यौ पूरन ससि
त्रिबिध पवन बहै थोरी थोरी । [5]
गति बिलास रस हास परस्पर भूतल अद्भुत जोरी ॥ [6]
श्रीजमुना जल बिथकित पुहुपनि बरषा
रतिपति डारत त्रिन तोरी । [7]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी
कौ रस रसना कहै को री ॥ [8]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (33)
मंडलाकार सखियों के मध्य श्री श्यामा-श्याम नृत्य कर रहे हैं जिससे अद्भुत गति प्रकट हो रही है । [1]
भोरी श्री राधा एवं श्याम सुंदर अंग-से-अंग मिलाकर सुधंग नृत्य कर रहे हैं, मुख मोड़ कर मुस्कुरा रहे हैं एवं आलिंगन कर रहे हैं जिससे रस प्रकट हो रहा है । [2]
सखी मृदंग बजा रही है, उसपर धीमी घात लगाकर ताल बंधा रही है । [3]
श्री ललिता जू विचित्र बाषा एवं सप्त सुरों में मधुर गान कर चित्त का आकर्षण कर रही हैं । [4]
श्री वृन्दावन खिले हुए पुष्पों से आच्छादित है, आकाश में पूर्ण चंद्र हैं एवं मंद-सुगंध सहित धीमी पवन बह रही है । [5]
नृत्य में गति-विलास एवं परस्पर में हास-परिहास करते हुए भूतल पर यह अद्भुत जोरी प्रकट हुई है । [6]
श्री यमुना जी का जल थकित हो गया है, आकाश से पुष्पों की वर्षा हो रही है एवं कामदेव इस सुन्दर जोरी पर तृण तोड़ रहे हैं अर्थात स्वयं को न्योंछावर कर रहे हैं । [7]
स्वामी श्री हरिदास जी के स्वामी श्री श्यामा-कुंजबिहारी के इस अद्भुत रस का वर्णन कौन कर सकता है ? [8]

