ब्रजवासियों को गोवर्धन पूजा करते देख देवराज इन्द्र क्रोधित हो ब्रज में भीषण वर्षा करने लगे लेकिन श्री कृष्ण द्वारा ब्रजवासियों एवं गायों की रक्षा तथा अपने प्रयास को विफल होते देख इन्द्र समझ गए की श्री कृष्ण ही परम पुरोषत्तम भगवान हैं । ऐसा विचार कर इन्द्र भयभीत हो गए ।
देवमाताओं ने इन्द्र को प्रेरित किया – “पुत्र ! सुरभि गौ को लेकर जाओ, वे गोपाल हैं । गौदर्शन से उनका हृदय गद्गद हो जायेगा । सुरभि सर्वेश को और सर्वेश को सुरभि अत्यन्त प्रिय है ।"
देवराज इन्द्र सुरभि गाय को लेकर श्री कृष्ण के पास आये । इन्द्र ने देखा भगवान एक शिला पर बैठे हैं । इन्द्र ऐरावत से नीचे उतरे और अपना मुकुट श्री कृष्ण के चरणों में रख दिया एवं अपने अपराध की क्षमा मांगने लगे । इन्द्र ने श्री कृष्ण की स्तुति की एवं गो, गोप, गोपी और ब्रज सबका आनन्दवर्धक और पोषक होने के कारण गोविन्द नामकरण किया । सुरभि गाय ने अपने दुग्ध से श्री कृष्ण का अभिषेक किया जिससे यह गोविन्द कुण्ड बना ।
सुरभि सुरपति संग लिये निरखि कृष्ण मुख इन्दु ।
कियो राज अभिषेक तहँ भयौ कुण्ड गोविन्द ॥
-श्री जगदानन्द जी
गोविन्द कुण्ड बड़े-बड़े पापों को हर लेने वाला परम पावन तीर्थ है । गोविन्द कुण्ड गिरिराज के अधर हैं । यह सुरम्य स्थल अनेकों सरस लीलाओं को संजोये है ।
गोविन्द कुण्ड से सम्बंधित श्रीनाथजी की लीलाएं :
प्रथम प्रसंग :
एक समय श्री गोविन्द स्वामी खेल के दांव को लेकर श्रीनाथजी से क्रोधित होकर इसी गोविन्द कुण्ड पर बैठकर श्रीनाथजी की राह देख रहे थे कि जब श्रीनाथजी आएंगे तो बिना मारे उन्हें छोडूंगा नहीं -
पोत लैके आयो भाजि गँवार ।
खोलि किबार धस्यो घर भीतर सिखे दिये लगवार ॥
कबहुँ तो निकसैगौ बाहर ऐसी दुऊँगो मार ।
'गोविन्द' प्रभु सौ बैर अब करिकै सुखी न सोवै यार ॥
गुसाईं श्री विट्ठलनाथजी ने गोविन्द स्वामी को मनाया जिससे उनका क्रोध शांत हुआ तब जाकर गोविन्द स्वामी ने श्रीनाथजी के संग प्रसाद पाया ।
द्वितीय प्रसंग :
एक समय श्रीनाथजी कान्हा भंगी के साथ खेल रहे थे । तभी उन्हें गोविन्द स्वामी ने देख लिया । गोविन्द स्वामी ने कहा कि गुसाईं जी मंदिर में कितना अचार-विचार रखते हैं । अब तुम्हें इस गोविन्द कुण्ड में स्नान करना पड़ेगा तभी मंदिर में प्रवेश करना । श्रीनाथजी जैसे ही कुण्ड के किनारे आये तो पीछे से गोविन्द स्वामी ने उन्हें धक्का देकर कुण्ड में गिरा दिया एवं ताली बजाकर हँसते हुए वहां से भाग गए । श्रीनाथजी भीगे वस्त्र में मंदिर पधारे । गुसाईं जी ने जब श्रीनाथजी से पूछा तो श्रीनाथजी ने कहा गोविन्द ने मुझे कुंड में धक्का दे दिया था । गुसाईं जी ने गोविन्द को बुला कर पूछा तो गोविन्द स्वामी ने बताया की श्रीनाथजी कान्हा भंगी के साथ खेल रहे थे । इन्हें पवित्र करने के लिए ही मैंने इन्हें कुंड में धक्का दिया था । यह सुनकर गुसाईं जी शांत हुए ।
तृतीय प्रसंग :
रसखान भी श्रीनाथजी के दर्शन करने आये, लेकिन म्लेच्छ समझकर किसी ने अन्दर न जाने दिया, धक्का देकर मन्दिर से बाहर कर दिया । रसखान ने सुन रखा था कि गोविन्द कुण्ड श्रीनाथजी का क्रीड़ा-स्थल है । वह नित्य यहाँ अपने यारों के साथ खेलने आता है, सो गोविन्द सर पर आकर बैठ गये । तीन दिवस हो चले, अन्न-जल को तिलांजलि दिये । प्राण विकल हो रहे थे किन्तु निकल भी नहीं रहे थे । चौथे दिन गुसाँई जी श्रीनाथजी को साथ लेकर आये –
मोहन छवि 'रसखान' लखि अब दृग अपने नाहिं ।
खैंचत आवत धनुष से छूटत शर से जाहिं ॥
इसके बाद गोविन्द कुण्ड में स्नान कर रसखान जी वल्लभकुल में दीक्षित हुए ।
चतुर्थ प्रसंग :
रहीम जी की आपबीती भी यही है । ये भी सुन्दरता के सागर श्यामसुन्दर का सौन्दर्य सुनकर यतीपुरा (गोवर्धन) आये, दर्शनार्थ । पठान देह देखकर द्वारपालों ने बाहर ढकेल दिया, झुंझलाकर आ गये और गोविन्द कुण्ड की छतरी पर बैठ गये ।
श्रीनाथजी भोजन की थाल लेकर स्वयं आये लेकिन रहीम जी ने श्रीनाथजी की ओर से मुँह फेर लिया । श्रीनाथजी थाल रखकर अन्तर्धान हो गये । एक बार देखने के बाद अधिक समय तक भला कोई कैसे अपने नेत्र निग्रह कर सकता है? नेत्रों ने पुनः वह दर्शन चाहा पीछे घूमे, किन्तु तब तक श्रीनाथजी अन्तर्धान हो गये थे । अब तो विरह ने व्याकुल कर दिया भुवन मन-मदन मोहन की मञ्जुल मूर्ति देखने को ।
कमलदल नैंननि की उनमानि ।
बिसरत नाहिं सखी मो मन ते मन्द मन्द मुस्कानि ॥
ऐसा लगा मानो ये देह, वियोगाग्नि में दग्ध हो जाएगा । पलक ऊपर उठती है किन्तु कमलनयन को न देखकर फिर झप जाती है । इस व्याकुलता ने वात्सल्य धाम को फिर से बुला लिया, रहीम जी दर्शन करके मगन हो गये ।
स्थान :
गोविन्द कुण्ड गोवर्धन के आन्योर ग्राम में स्थित है ।

