(राग भैरव)
श्री राधावर भज श्री राधावर भजि ।
और सकल धर्मनि कौं तू तजि ॥ [1]
होइ अनन्य एक रस गाहौ ।
रसिकनि-संग जु सदा निवाहौ ॥ [2]
आँन धर्म व्रत नेम न कीजै ।
जुगल किसोर-चरन चित दीजै ॥ [3]
श्री वृंदावन घन-कुंज निहारौ ।
'हित ध्रुव' तेहि ठाँ वास बिचारौ ॥ [4]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (94)
श्री हित ध्रुवदास जी रसिक उपासकों को उपदेश करते हैं कि तुम श्री राधावल्लभ का ही भजन करो, केवल श्री राधावल्लभ का ही भजन करो और अन्य धर्मों को सर्वथा त्याग दो । [1]
अपने इष्ट के प्रति अनन्य होकर निरन्तर व्यवधान रहित उपासना के द्वारा रसका अवगाहन करो । जैसे भी हो सदा-सर्वदा रसिक महापुरुषों के सत्सङ्ग का तथा श्रद्धाभक्ति, सेवा का कर्त्तव्य-धर्म निर्वाह करो । [2]
अन्य धर्मों में बताये गये व्रत-नियमादि का किञ्चित् भी आश्रय मत लो, केवल युगल किशोर श्री लाड़िली-लाल के चरणों में ही चित्त का सर्वतोभावेन् समर्पण करो । [3]
नित्य धाम श्री वृन्दावन के प्रेम-पुञ्ज सघन कुञ्जों का ही ध्यान-भावना में दर्शन करते रहो और जैसे बने
वैसे ही मङ्गलमय श्री वृन्दावन धाम में सशरीर निवास करने का विचार निश्चित करो । [4]
श्री राधावर भज श्री राधावर भजि ।
और सकल धर्मनि कौं तू तजि ॥ [1]
होइ अनन्य एक रस गाहौ ।
रसिकनि-संग जु सदा निवाहौ ॥ [2]
आँन धर्म व्रत नेम न कीजै ।
जुगल किसोर-चरन चित दीजै ॥ [3]
श्री वृंदावन घन-कुंज निहारौ ।
'हित ध्रुव' तेहि ठाँ वास बिचारौ ॥ [4]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (94)
श्री हित ध्रुवदास जी रसिक उपासकों को उपदेश करते हैं कि तुम श्री राधावल्लभ का ही भजन करो, केवल श्री राधावल्लभ का ही भजन करो और अन्य धर्मों को सर्वथा त्याग दो । [1]
अपने इष्ट के प्रति अनन्य होकर निरन्तर व्यवधान रहित उपासना के द्वारा रसका अवगाहन करो । जैसे भी हो सदा-सर्वदा रसिक महापुरुषों के सत्सङ्ग का तथा श्रद्धाभक्ति, सेवा का कर्त्तव्य-धर्म निर्वाह करो । [2]
अन्य धर्मों में बताये गये व्रत-नियमादि का किञ्चित् भी आश्रय मत लो, केवल युगल किशोर श्री लाड़िली-लाल के चरणों में ही चित्त का सर्वतोभावेन् समर्पण करो । [3]
नित्य धाम श्री वृन्दावन के प्रेम-पुञ्ज सघन कुञ्जों का ही ध्यान-भावना में दर्शन करते रहो और जैसे बने
वैसे ही मङ्गलमय श्री वृन्दावन धाम में सशरीर निवास करने का विचार निश्चित करो । [4]

