राशब्दोच्चारणाद् भक्तो भक्तिं मुक्तिं च राति सः - नारद पाञ्चरात्र (2.3.38)

राशब्दोच्चारणाद् भक्तो भक्तिं मुक्तिं च राति सः - नारद पाञ्चरात्र (2.3.38)

राशब्दोच्चारणाद् भक्तो भक्तिं मुक्तिं च राति सः ।
धाशब्दोच्चारणेनैव धावत्येव हरे: पदम् ॥
- नारद पाञ्चरात्र (2.3.38)

‘रा' शब्द के उच्चारण से भक्त को (अत्यन्त दुर्लभा) भक्ति की प्राप्ति होती है जिससे सांसारिक बंधन से स्वतः ही मुक्ति की प्राप्ति भी हो जाती है तथा 'धा' शब्द के उच्चारण से वह हरि पद की ओर शीघ्र गमन करता है अर्थात् भगवान् के चरणों की दास्यरति प्राप्त करता है ।