रसिक-सिरोमनि सुजान सुधानिधि हू की - श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (208)

रसिक-सिरोमनि सुजान सुधानिधि हू की - श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (208)

(कवित्त)
रसिक-सिरोमनि सुजान सुधानिधि हू की,
रसना रसैबे कौं रसीलो रसधाम है। [1]
जीवन बरसिबे आनंदघन आपुन पैं,
चातिक तें कोटिगुनी जक आठो जाम है॥ [2]
आरति पराई सोई जानै न बखानें बनै,
देखें दसा औरे बिसरत बिसराम है। [3]
साधा तन हेरियै निबेरियै सु बाधा वारि,
प्राननि आधार तिन्हैं राधा राधा नाम है॥ [4]

- श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (208)

रसिक शिरोमणि श्री कृष्ण की रसना को भी रस में भिगाने वाला राधा नाम रसीला रस धाम है। [1]

जिस प्रकार चातक को स्वाति की बूँद को ही ग्रहण करने की अभिलाषा रहती है, उसी प्रकार श्री कृष्ण की रसना को उससे कोटि कोटि गुना अधिक श्री राधा नाम (जो उनके लिए एक मात्र आनंद का घन है) के रस का पान करने की ही नित्य अभिलाषा रहती है। [2]

श्री कृष्ण के ह्रदय की व्याकुलता को उनके अतिरिक्त कौन जान सकता है जिसे बखान नहीं किया जा सकता। उनकी दशा कुछ और ही है, वे श्री राधा नाम के पान करने में इतने उन्मत्त हैं कि उन्हें अपनी सुध-बुध नहीं है। [3]

जिस नाम की शरण में रहने से समस्त बाधाओं का निवारण होता है वही “श्री राधा राधा” नाम ही श्री कृष्ण के प्राणों का आधार है। [4]