रंग भरी राजत अलकलड़ी री ।
ललिता ललित लिये जल झारी, ध्यावत सुन्दर वदन खड़ी री । [1]
प्रेम फलक दीपत अंग अंगनि, पिय के नव-नव-लाड़ लड़ी री ॥
अलबेलीअलि छकनि छकी प्रियतम नयनन माँझ गड़ी री ॥ [2]
- श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (66)
प्रेम-रंग में भरी अलकलड़ी श्री राधा विराज रही हैं । श्री ललिता जू जल की झारी लिए पास में खड़ी हैं और श्री राधा के सुन्दर अंगों को निहार कर उन्मत्त हैं । [1]
श्री राधा के प्रत्येक अंग श्री श्यामसुंदर के नव-नव लाड़ के स्मरण के कारण प्रेम से उज्जवल हैं । श्री अलबेली अलि जी कहते हैं "श्री राधा अपने नेत्रों में श्री श्यामसुंदर की छवि को बसाये उनके प्रेम से छकी हुई है ।" [2]
ललिता ललित लिये जल झारी, ध्यावत सुन्दर वदन खड़ी री । [1]
प्रेम फलक दीपत अंग अंगनि, पिय के नव-नव-लाड़ लड़ी री ॥
अलबेलीअलि छकनि छकी प्रियतम नयनन माँझ गड़ी री ॥ [2]
- श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (66)
प्रेम-रंग में भरी अलकलड़ी श्री राधा विराज रही हैं । श्री ललिता जू जल की झारी लिए पास में खड़ी हैं और श्री राधा के सुन्दर अंगों को निहार कर उन्मत्त हैं । [1]
श्री राधा के प्रत्येक अंग श्री श्यामसुंदर के नव-नव लाड़ के स्मरण के कारण प्रेम से उज्जवल हैं । श्री अलबेली अलि जी कहते हैं "श्री राधा अपने नेत्रों में श्री श्यामसुंदर की छवि को बसाये उनके प्रेम से छकी हुई है ।" [2]

