चित चिंता तजि, डारिकैं, भार, जगत के नेम। रे मन, स्यामा स्याम की, सरन गहौ करि प्रेम॥ - ब्रज के दोहे हे मन, तू अपनी समस्त चिंताओं एवं सांसारिक नियम-रूपी भार को त्यागकर एकमात्र श्री श्यामा-श्याम की शरण ग्रहण कर और उनसे प्रेम बढ़ा।