बलिहारी रास विहारिन की - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (646)

बलिहारी रास विहारिन की - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (646)

(राग सारंग)
बलिहारी रास विहारिन की ।
मरकत मणि कंचन मणि माला ग्रंथित नंद कुमार की ॥ [1]
सारंग राग अलापत गावत विच मिलवत गति तालन की ।
नाचत गावत बेनु बजावत लेत उदार उगारन की ॥ [2]
जमुना पुलिन मल्लिका मुकुलित त्रिविध समीर सुढारन की ।
'कृष्णदास' बल गिरधर नवरंग सुरत नाथ सुकुमारन की ॥ [3]

- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (646)

श्री रासबिहारी-बिहारिणी जू की बलिहारी है । श्री कृष्ण मरकत मणि हैं एवं श्री राधा स्वर्ण-मणि माला हैं जो श्री कृष्ण की ग्रीवा में ग्रंथित हैं । [1]

श्री युगल किशोर सारंग राग में गान कर रहे हैं और बीच बीच में ताल मिला रहे हैं । दिव्य दम्पति नृत्य एवं गान कर रहे हैं, श्री कृष्ण मधुर वंशी बजा रहे हैं । [2]

श्री यमुना पुलिन पर मल्लिका पुष्प खिले हुए हैं, सुगन्धित-शीतल पवन धीमी गति से प्रवाहित हो रही है । श्री कृष्णदास जी कहते हैं "नित्य-नवीन प्रेम-रंग से अनुरंजित गिरिधर श्री कृष्ण एवं प्रेम-कौशला सुकुमारी श्री राधा की बलिहारी है ।" [3]