स्वर्ग से विशेष जहाँ - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (92)

स्वर्ग से विशेष जहाँ - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (92)

(कवित्त)
स्वर्ग से विशेष जहाँ ब्रज-रस-रसिकों को,
रहता है अतुल उत्साह नित्य आने में। [1]
होता प्रत्यक्ष दिव्य जीवन का विकास जहाँ,
एक बार प्रेम युक्त कृष्ण कृष्ण गाने में॥ [2]
प्यारी व्रजभूमि का प्रभाव ही है ऐसा कुछ,
चित्त फँस जाता पीत नीलाम्बर बाने में। [3]
प्यारे के साथ रहें प्रिया के कुञ्ज महलों में,
कैद कब होंगे हाय ! वृन्दावन थाने में ? [4]

- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (92)

ब्रज-रस रसिकजन स्वर्ग जाने की तुलना में वृंदावन जाने के लिए अधिक उत्साहित रहते हैं। [1]

यहाँ एक बार "कृष्ण कृष्ण" का प्रेमपूर्वक उच्चारण करने से प्रत्यक्ष दिव्य अनुभव होते हैं। [2]

यह इस ब्रज भूमि का ही प्रभाव है कि पीताम्बर और नीलाम्बर धारण करने वाले दिव्य दंपत्ति में मन स्वाभाविक रूप से उलझ जाता है। [3]

ऐसा कब होगा कि मैं सदैव अपने प्यारे कृष्ण और प्यारी राधारानी के साथ कुंज महल में निवास करूँगा। कब मुझे सदैव के लिए वृन्दावन के थाने में कैद मिलेगी ? [4]