जो है तो में मति कछू वस वृन्दावन षेत - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (100)

जो है तो में मति कछू वस वृन्दावन षेत - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (100)

जो है तो में मति कछू, वस वृन्दावन षेत ।
सोय रहे हू सेज पर, प्रेम भक्ति हिय देत ॥
- श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (100)

यदि भगवान की कृपा से अंतःकरण में थोड़ा भी विवेक प्रकट हुआ है, तो साधक को वृंदावन-रूपी रस-भूमि में ही निवास करना चाहिए, जहाँ अपनी सेज पर सोते हुए (विश्राम अवस्था) भी श्री हरि हृदय में प्रेम-भक्ति का संचार करते रहते हैं।