चात्रिक ज्यौं घन चंद चकोर - श्री नागरीदेव जु की वाणी, सिद्धांत के पद (29)

चात्रिक ज्यौं घन चंद चकोर - श्री नागरीदेव जु की वाणी, सिद्धांत के पद (29)

चात्रिक ज्यौं घन चंद चकोर, विपिन विनोद विलोकि हिया। [1]
ज्यौं जल मीन जियत मकरंद, कौ पान करै अलि व्है कैं हिया॥ [2]
दरसैं परसैं नित्यनागरीदास, प्रिया पिउ राखि हृदै मंहिया। [3]
मनसा वाचा कुंजबिहारी बिना, गति आन अनन्यनि कै नहिया॥ [4]

- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (29)

अनन्य रसिक जनों की रति समझाते हुए श्री नागरीदेव जी कहते हैं कि जिस प्रकार चातक पक्षी की अनन्य रति स्वाति-घन में, चकोर की चंद्रमा में होती है, वैसे ही वृंदावन के अनन्य रसिक जन श्री वृंदावन के नित्य-विहार रूपी महारसमय विलास को ही सतत निहारते रहते हैं। [1]

जैसे मछली का जीवन जल है, वैसे ही रसिक जन श्री युगल के अंग-सुगंध को भ्रमर की तरह पान करके जीते हैं। [2]

श्री नागरीदेव जी कहते हैं कि ऐसे अनन्य रसिक जन प्रिया-प्रियतम के सतत दरस-परस पाकर उनको अपने हृदय में नित्य ही बसा कर रखते हैं। [3]

ऐसे दृढ़ अनन्य जन के मन-वाणी में अपने इष्ट श्यामा कुंजबिहारी के अतिरिक्त इहलोक-परलोक में और कहीं कोई गति नहीं होती। [4]