आवति नेह की निधि प्यारी ।
रोम-रोम सुखदैंन स्याम कौं, श्रीवृषभानुदुलारी ॥ [1]
प्रथम समाज साज सचि संपति, अंग-अंग सुकुमारी ।
नव निकुंज नागरी-रवन मिलि, सुरस-सार वरषा री ॥ [2]
देत असीसनि निरखि जुवति, चिरु जोरी सदा-सदा री ।
श्रीगुरुराज-कृपा तें या छबि पर 'कल्यान' बलिहारी ॥ [3]
- श्री कल्याण पुजारी जी, श्री हित कल्याण पुजारी जी की वाणी (66)
रोम-रोम सुखदैंन स्याम कौं, श्रीवृषभानुदुलारी ॥ [1]
प्रथम समाज साज सचि संपति, अंग-अंग सुकुमारी ।
नव निकुंज नागरी-रवन मिलि, सुरस-सार वरषा री ॥ [2]
देत असीसनि निरखि जुवति, चिरु जोरी सदा-सदा री ।
श्रीगुरुराज-कृपा तें या छबि पर 'कल्यान' बलिहारी ॥ [3]
- श्री कल्याण पुजारी जी, श्री हित कल्याण पुजारी जी की वाणी (66)
प्रेम की राशि प्यारी श्री वृषभानुदुलारी आ रही हैं, जिनका रोम-रोम प्यारे श्री कृष्ण को सुख प्रदान करता है । [1]
श्री राधा ने सर्वप्रथम विविध प्रकार के श्रृंगार दल से स्वयं को अलंकृत किया जिनका अंग अंग परम सुकुमार है । नव-निकुंज में श्री राधा रमण बिहारी मिलकर प्रेम-रस के सार की वर्षा करते हैं । [2]
सखियाँ श्री श्यामाश्याम की सुन्दर जोड़ी को निहारकर उन्हें चिरजीवी होने का आशीर्वाद देती हैं । श्री कल्याण पुजारी जी कहते हैं कि श्री गुरुदेव की कृपा से श्री श्यामाश्याम की इस छवि पर मैं स्वयं को न्यौछावर करता हूँ । [3]

